जमीन सम्पत्ति है या जीवन का आधार ?

— अशोक भारत

यह चिन्ता का विषय है कि देश में खेती की जमीन तेजी से घट रही है। पिछले एक दशक में खेती योग्य 12.5 करोड़ हेक्टेयर में से 1 करोड़ 80 लाख हेक्टेयर जमीन खेती से बाहर हो गयी है। खेती की जमीन का तेजी से घटने के गम्भीर परिणाम होंगे। पहले तो इससे अनाज के उत्पादन एवं खाद्य सुरक्षा पर प्रतिवूâल असर पड़ेगा। खाद्यान्न के लिए विदेशों पर निर्भरता बढ़ेगी, इसे आयात करना पड़ेगा जो देश के लिए घातक होगा। इस समय देश में हर चौथा आदमी भूखा है, लगभग हर दूसरा बच्चा (47%) कुपोषण का शिकार है। इससे स्थिति और भी खराब होगी।

दूसरी देश में भूमिहीनता की समस्या बढ़ेगी। भूमिहीनता की समस्या देश में गरीबी, बेरोजगारी एवं गैर-बराबरी का मुख्य कारण है। अंग्रेजों की भूमि संबंधी गलत नीति के कारण देश में भूमिहीनता की समस्या काफी बढ़ गयी। Continue reading जमीन सम्पत्ति है या जीवन का आधार ?

गाँधी का शिक्षा-दर्शन

डाॅ. श्रीभगवान सिंह

भारतीय स्वाधीनता-संग्राम का इतिहास इस बात का साक्षी है कि 1920 से 1946 तक इसकी निर्णायक लड़ाई महात्मा गाँधी के नेतृत्व में लड़ी गई और राष्ट्र ने उन्हें ‘राष्ट्रपिता’ के रूप में समादृत कर अपनी कृतज्ञता प्रकट की। यह राष्ट्रपिता ‘दे दी हमें आजादी बिना खड़्ग, बिन ढाल’ के प्रतीक पुरूष के रूप में जरूर याद रखे गये, किन्तु वे जिन मूल्यों के सहारे उपनिवेशवादी शिकंजों में जर्जर हो गये भारत का कायाकल्प करना चाहते थे, उसे आजाद भारत के शासक बन बैठे उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी निरंतर विस्मृत करते गये। वस्तुतः गाँधी जी का सपना देश की राजनीतिक स्वाधीनता की प्राप्ति तक सीमित नहीं था, बल्कि वे आर्थिक, शैक्षिक, आध्यात्मिक, नैतिक, ग्रामोत्थान आदि सभी क्षेत्रों में भारत कीदेशज परम्पराओं का नवीनीकरण करते हुए नये भारत का निर्माण करना चाहते थे। Continue reading गाँधी का शिक्षा-दर्शन

गाॅधी की दीक्षा

– राधा भट्ट

भाई चन्दनपाल अगस्त 2012 से कोकराझार में चल रहे ‘‘शान्तियात्रा’’ अभियान की एक जोड़ने वाली कड़ी रहे हैं। बी.टी.ए.डी. में शान्ति कार्य से पूरे देश को  जोड़ने के काम को उन्होंने अपना सम्पूर्ण तन-मन, सोच -समझ, दिल-दिमाग और भावना-प्रतिभावना दी है। जिस प्रकार उन्होंने यह जुड़ाव खड़ा किया उतने ही मनोयोग की परवाह किये बिना उन्होंने बी.टी.ए.डी. के विभिन्न समुदायों को एक दूसरे से जोड़ने में भी स्वयं को एक कड़ी बनाया है।

2 मई 2014 को सर्वसेवा संघ की कार्य समिति हैदराबाद में चल रही थी। खबर आई कि बी.टी.ए.डी. में तीन मुस्लिम गाॅवों के 37 लोगों को मार दिया गया है। इस खबर से चन्दनभाई केवल दुखी ही नहीं हुए, बी.टी.ए.डी. में पहुॅचने और हालात को शान्त Continue reading गाॅधी की दीक्षा

नशा समाज को पंगु बनाता है

—अशोक भारत

देश में नशा का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है। खास करके युवा वर्ग इसकी चपेट में आ रहे हैं, जो चिन्ताजनक है। मदिरापान करने वालों की संख्या में हो रही बढ़ोतरी के कई पहलू हैं, जिनमें सरकारी नीति, आधुनिक बनने का गलत अहसास, सामाजिक नियंत्रण का ढीला पड़ना, बढ़ रही सामाजिक स्वीकृति तथा विकास की गलत अवधारणा (मॉडल) शामिल है।

सरकारों का जोर मदिरा का उत्पादन एवं बिक्री से ज्यादा से ज्यादा आमदनी करना है। उत्तर प्रदेश सरकार के आबकारी विभाग के वर्ष 2012-13 के कार्यपूर्ति दिग्दर्शन में कहा गया है कि ‘उपभोक्ताओं को मानक गुणवत्ता की मदिरा उचित दाम पर उपलब्ध कराने व प्रदेश के राजस्व में समुचित वृद्धि सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश सरकार Continue reading नशा समाज को पंगु बनाता है

विकास की दिशा और विकल्प

–  सच्चिदानंद सिन्हा

विकास की वर्तमान दिशा सिर्फ आर्थिक नीतियों का परिणाम नहीं बल्कि एक खास तरह की दृष्टि और आधुनिक औद्योगिक सभ्यता के केंद्रीय मूल्यों के परिणाम है, जो आर्थिक नीतियों के पीछे भी हैं। यों तो ये एक मूल्य व्यापारिक हैं, लेकिन इनकी शक्ति का स्त्रोत एक व्यापक विश्वदृष्टि है। इस दृष्टि को बनाने में अनेक वैचारिक धाराओं का योगदान रहा है, लेकिन इसे साफ तौर से अभिव्यक्ति और आधार मिला मार्क्स और डारविन के सिद्धांतों से।

इस वैचारिक युग (मार्क्स-डारविन युग) की शुरुआत 1948 में मार्क्स-एगेल्स के ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ के प्रकाशन से मानी जा सकती है। इस घोषणापत्र में मानव समाज को अनिवार्य रूप से विकासशील माना गया है और यह कहा गया है कि उनकी परिणति ‘कम्युनिज्म’ की स्थापना से होगी। Continue reading विकास की दिशा और विकल्प

गांधी और भगत सिंह : तथ्य बोलते हैं

-श्रीभगवान सिंह

आधुनिक भारत की महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक शख्सियतों में भगत सिंह उसी वक्त शुमार हो गये जब 23 मार्च,  1931 को देश की आजादी के लिए उन्होंने हँसते-हँसते फाँसी के फन्दे को चूम लिया। तब से उनके आत्म बलिदान एवं विचारों के महत्त्व को लेकर लगातार लिखा जाता रहा है, हर वर्ष 23 मार्च को देश के विभिन्न नगरों में विचार-गोष्ठियों एवं स्मृति-सभाओं का आयोजन होता रहा है। यह निश्चय ही एक कृतज्ञ राष्ट्र का अपने एक महान शहीद के प्रति कृतज्ञता का प्रमाण है। उनकी जन्मशाताब्दी के अवसर पर भी भगत सिंह की शहादत एवं विचारों को लेकर काफी कुछ लिखा गया जिसे देख कर प्रसन्नता होती है कि हमारे बुद्धिजीवी वर्ग ने भगत सिंह की कुर्बानी को विस्मृत नहीं किया है। इस क्रम में भगत सिंह के विचारों के महत्त्व को काफी उजागर किया गया है। बहुतों ने उन्हें ‘शहीदेआजम’ की संज्ञा से विभूषित किया है, दूसरी तरफ उन्हें माक्र्स एवं गांधी के समतुल्य व्यक्ति के रूप में मूल्यांकित करने के प्रयास भी हुए हैं।

चौबीस वर्ष की उम्र में पहुँचा युवक जहां आम तौर पर यौवन की नैसर्गिक माँग पर गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर स्त्री-सहवास एवं घर-बसाने की इच्छा रखता है, वहां भगत सिंह जैसे युवक ने इस उम्र में पहुंच कर देश की आजादी के लिए फाँसी के फन्दे को अपनी नियति बना लिया। इसके लिए वे निस्संदेह हम सब की दृष्टि में आदर एवं अभिनंदन के पात्र हैं। किन्तु ऐसा करने में भगत सिंह न अकेले थे, Continue reading गांधी और भगत सिंह : तथ्य बोलते हैं

गांधी का करिश्मा कायम है

– राधा भट्ट

देश के लगभग हर रंगत के राजनेताओं ने गांधीजी को अव्यावहारिक अतएव अप्रासंगिक मान लिया। लेकिन कोकराझार जैसे हिंसाग्रस्त क्षेत्र में यह छोटा-सा दिखने वाला प्रयोग साक्षी है कि महात्मा गांधी और उनकी अहिंसा आज भी हमारी बहुत-सी समस्याओं का जीवन्त समाधान है।

गांधी की मानव देह की हत्या को 66 वर्ष बीत चुके हैं, आजद भारत द्वारा की गई उनके वैचारिक अस्तित्व की हत्या (अवहेलना) को भी 67 वर्ष पूरे हो रहे हैं। गांधी भारत के मुखपृष्ठ से लगभग मिट से गए हैं, बाकी है उनकी खोखली मूर्तियां, जो चौराहों पर लाखोंलाख कारों का धुंधा और धूल फांकती रहती हैं। गांधी की नित्य-निमित्त की वस्तुओं से संग्रहालय भर गए हैं। नित नूतन तकनीक से उनके बीत चुके जीवन को चलचित्रों में सजीव करने का भ्रम पैदा किया जा रहा है। Continue reading गांधी का करिश्मा कायम है

वर्तमान समस्याओं के सन्दर्भ में हिन्द स्वराज की प्रासंगिकता

 – प्रो. समदोंग रिनपोचे

आज का व्याख्यान सिद्धराज ढड्ढा की स्मृति में आयोजित किया गया है। मैं अपने हृदय से उनके प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता की भावना प्रकट करना चाहता हूँ। उनका जीवन एक आर्दश जीवन रहा है। विशेष रूप से गांधी-विचार को इस देश में जीवित रखने के कार्यों में, संकट की घड़ियों में जयप्रकाशजी के साथ रहकर भी जो कुछ उन्होंने कार्य किया, सर्व सेवा संघ जैसी अनेक संस्थाओं का संचालन कर मार्गदर्शन किया वह केवल सुमिरन करने की बात भर नहीं है अपितु एक दिशा एंव मार्ग प्रशस्त करनेवाला है। हम उसका सुमिरन करेंगे और अनुसरण करने का प्रयास तभी उनके प्रति श्रद्धांजलि दे पायेंगे, ऐसा मेरा विचार है।

आज की बातचित करने का विषय है ‘हिन्द स्वराज’ के आधार पर समाज की विकृत-व्यवस्था को कैसे सुधारा जाये। आजकल दो बातों पर बल दिया जाता है। एक तो प्रासंगिकता और दूसरा विकल्प। बार-बार पूछा जाता है कि गांधी का विचार आज प्रासंगिक है कि नहीं और दूसरा यह कि इसका विकल्प क्या है? जब गांधी के विचारों के अनुरूप जीवन को संचालित नहीं करना हो तो यह प्रश्न प्रासंगिक नहीं रहता है, अपितु एकेडेमिक हो जाता है। Continue reading वर्तमान समस्याओं के सन्दर्भ में हिन्द स्वराज की प्रासंगिकता