गांधी और भगत सिंह : तथ्य बोलते हैं

-श्रीभगवान सिंह

आधुनिक भारत की महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक शख्सियतों में भगत सिंह उसी वक्त शुमार हो गये जब 23 मार्च,  1931 को देश की आजादी के लिए उन्होंने हँसते-हँसते फाँसी के फन्दे को चूम लिया। तब से उनके आत्म बलिदान एवं विचारों के महत्त्व को लेकर लगातार लिखा जाता रहा है, हर वर्ष 23 मार्च को देश के विभिन्न नगरों में विचार-गोष्ठियों एवं स्मृति-सभाओं का आयोजन होता रहा है। यह निश्चय ही एक कृतज्ञ राष्ट्र का अपने एक महान शहीद के प्रति कृतज्ञता का प्रमाण है। उनकी जन्मशाताब्दी के अवसर पर भी भगत सिंह की शहादत एवं विचारों को लेकर काफी कुछ लिखा गया जिसे देख कर प्रसन्नता होती है कि हमारे बुद्धिजीवी वर्ग ने भगत सिंह की कुर्बानी को विस्मृत नहीं किया है। इस क्रम में भगत सिंह के विचारों के महत्त्व को काफी उजागर किया गया है। बहुतों ने उन्हें ‘शहीदेआजम’ की संज्ञा से विभूषित किया है, दूसरी तरफ उन्हें माक्र्स एवं गांधी के समतुल्य व्यक्ति के रूप में मूल्यांकित करने के प्रयास भी हुए हैं।

चौबीस वर्ष की उम्र में पहुँचा युवक जहां आम तौर पर यौवन की नैसर्गिक माँग पर गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर स्त्री-सहवास एवं घर-बसाने की इच्छा रखता है, वहां भगत सिंह जैसे युवक ने इस उम्र में पहुंच कर देश की आजादी के लिए फाँसी के फन्दे को अपनी नियति बना लिया। इसके लिए वे निस्संदेह हम सब की दृष्टि में आदर एवं अभिनंदन के पात्र हैं। किन्तु ऐसा करने में भगत सिंह न अकेले थे, Continue reading गांधी और भगत सिंह : तथ्य बोलते हैं

गांधी का करिश्मा कायम है

– राधा भट्ट

देश के लगभग हर रंगत के राजनेताओं ने गांधीजी को अव्यावहारिक अतएव अप्रासंगिक मान लिया। लेकिन कोकराझार जैसे हिंसाग्रस्त क्षेत्र में यह छोटा-सा दिखने वाला प्रयोग साक्षी है कि महात्मा गांधी और उनकी अहिंसा आज भी हमारी बहुत-सी समस्याओं का जीवन्त समाधान है।

गांधी की मानव देह की हत्या को 66 वर्ष बीत चुके हैं, आजद भारत द्वारा की गई उनके वैचारिक अस्तित्व की हत्या (अवहेलना) को भी 67 वर्ष पूरे हो रहे हैं। गांधी भारत के मुखपृष्ठ से लगभग मिट से गए हैं, बाकी है उनकी खोखली मूर्तियां, जो चौराहों पर लाखोंलाख कारों का धुंधा और धूल फांकती रहती हैं। गांधी की नित्य-निमित्त की वस्तुओं से संग्रहालय भर गए हैं। नित नूतन तकनीक से उनके बीत चुके जीवन को चलचित्रों में सजीव करने का भ्रम पैदा किया जा रहा है। Continue reading गांधी का करिश्मा कायम है

वर्तमान समस्याओं के सन्दर्भ में हिन्द स्वराज की प्रासंगिकता

 – प्रो. समदोंग रिनपोचे

आज का व्याख्यान सिद्धराज ढड्ढा की स्मृति में आयोजित किया गया है। मैं अपने हृदय से उनके प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता की भावना प्रकट करना चाहता हूँ। उनका जीवन एक आर्दश जीवन रहा है। विशेष रूप से गांधी-विचार को इस देश में जीवित रखने के कार्यों में, संकट की घड़ियों में जयप्रकाशजी के साथ रहकर भी जो कुछ उन्होंने कार्य किया, सर्व सेवा संघ जैसी अनेक संस्थाओं का संचालन कर मार्गदर्शन किया वह केवल सुमिरन करने की बात भर नहीं है अपितु एक दिशा एंव मार्ग प्रशस्त करनेवाला है। हम उसका सुमिरन करेंगे और अनुसरण करने का प्रयास तभी उनके प्रति श्रद्धांजलि दे पायेंगे, ऐसा मेरा विचार है।

आज की बातचित करने का विषय है ‘हिन्द स्वराज’ के आधार पर समाज की विकृत-व्यवस्था को कैसे सुधारा जाये। आजकल दो बातों पर बल दिया जाता है। एक तो प्रासंगिकता और दूसरा विकल्प। बार-बार पूछा जाता है कि गांधी का विचार आज प्रासंगिक है कि नहीं और दूसरा यह कि इसका विकल्प क्या है? जब गांधी के विचारों के अनुरूप जीवन को संचालित नहीं करना हो तो यह प्रश्न प्रासंगिक नहीं रहता है, अपितु एकेडेमिक हो जाता है। Continue reading वर्तमान समस्याओं के सन्दर्भ में हिन्द स्वराज की प्रासंगिकता