विकास की दिशा और विकल्प

–  सच्चिदानंद सिन्हा

विकास की वर्तमान दिशा सिर्फ आर्थिक नीतियों का परिणाम नहीं बल्कि एक खास तरह की दृष्टि और आधुनिक औद्योगिक सभ्यता के केंद्रीय मूल्यों के परिणाम है, जो आर्थिक नीतियों के पीछे भी हैं। यों तो ये एक मूल्य व्यापारिक हैं, लेकिन इनकी शक्ति का स्त्रोत एक व्यापक विश्वदृष्टि है। इस दृष्टि को बनाने में अनेक वैचारिक धाराओं का योगदान रहा है, लेकिन इसे साफ तौर से अभिव्यक्ति और आधार मिला मार्क्स और डारविन के सिद्धांतों से।

इस वैचारिक युग (मार्क्स-डारविन युग) की शुरुआत 1948 में मार्क्स-एगेल्स के ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ के प्रकाशन से मानी जा सकती है। इस घोषणापत्र में मानव समाज को अनिवार्य रूप से विकासशील माना गया है और यह कहा गया है कि उनकी परिणति ‘कम्युनिज्म’ की स्थापना से होगी। Continue reading विकास की दिशा और विकल्प