गांधी का करिश्मा कायम है

– राधा भट्ट

देश के लगभग हर रंगत के राजनेताओं ने गांधीजी को अव्यावहारिक अतएव अप्रासंगिक मान लिया। लेकिन कोकराझार जैसे हिंसाग्रस्त क्षेत्र में यह छोटा-सा दिखने वाला प्रयोग साक्षी है कि महात्मा गांधी और उनकी अहिंसा आज भी हमारी बहुत-सी समस्याओं का जीवन्त समाधान है।

गांधी की मानव देह की हत्या को 66 वर्ष बीत चुके हैं, आजद भारत द्वारा की गई उनके वैचारिक अस्तित्व की हत्या (अवहेलना) को भी 67 वर्ष पूरे हो रहे हैं। गांधी भारत के मुखपृष्ठ से लगभग मिट से गए हैं, बाकी है उनकी खोखली मूर्तियां, जो चौराहों पर लाखोंलाख कारों का धुंधा और धूल फांकती रहती हैं। गांधी की नित्य-निमित्त की वस्तुओं से संग्रहालय भर गए हैं। नित नूतन तकनीक से उनके बीत चुके जीवन को चलचित्रों में सजीव करने का भ्रम पैदा किया जा रहा है। बौद्धिक शोधों ने पुस्तकों के पृष्ठ-दर-पृष्ठ रँगकर ग्रंथालयों की आलमारियां सजा दी हैं। पर असली गांधी को तो हमने जमीन में इतने गहरे में गाड़ दिया है कि वह ऐसी कोशिशों से भला कहां करवट ले पाएंगे?

गांधी का करिश्मा उनके जीवनकाल में भी अनेक लोगों को अप्रत्याशित व अविश्वसनीय लगता था। आज भी यही लगता है। तब कांग्रेस के कई नेताओं ने उनकी दांडी-यात्रा और नमक-सत्याग्रह को प्रारंभ में आजादी के आंदोलन के लिए प्रासंगिक ही नहीं माना था। ‘मुट्ठी भर नमक उठा लेने से क्या हो जाएगा?’ पर उसी नमक सत्याग्रह ने ब्रिटिश राज की नींव हिला दी थी। बिना शस्त्र उठाए एक महाबली साम्राज्य के पंजों से देश को मुक्त करा देना एक करिश्मा ही था, जिसका कोई उदाहरण उसके पूर्व के इतिहास में देखने को नहीं मिला। गांधी ऐसे ही एक अभिनव आरोहण से इस देश को और विश्व को ‘हिंसामुक्त मानव समाज’ बनाना चाहते थे, जो फिर से एक करिश्मा ही होता। किन्तु उस नई राह पर चढ़ने का साहस हमारे कर्णधार नहीं जुटा पाए। वास्तव में, वह आजादी का एक नया अवतार होता। संविधान में अंकित ‘वी द पीपुल’ का हर व्यक्ति के जीवन में सही इजहार होता। लोग निर्भय होते अपनी बुनियादी आवश्यकताओं के लिए। रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की लगभग एक-सी गुणवत्ता इस देश पर रहने वाले हर व्यक्ति को प्राप्त हो पायी होती और तब हिंसा का यह तांडव भी न होता।

आज तो अनेक प्रकार की हिंसा से वही ‘वी द पीपुल’ खुद डरा हुआ है। धर्म, जाति, सम्प्रदाय, वर्ग, दल, पंथ, विचारधारा और कुविचारधारा की बंदूवेंâ उसकी ओर तनी हुई हैं। गरीब डरा हुआ है, तो अमीर भी डरा है। इस डर से देश को कौन बाहर निकाल सकता है? मेरे पास इस प्रश्न का एक ही उत्तर है, ‘गांधी’। मैं यहां कोकराझार के आम लोगों के बीच बैठकर गांधी का करिश्मा प्रत्यक्ष देख रही हूं। 2012 के जुलाई माह में असम प्रदेश के अंदर बने इस बोडोलैंड टेरिटोरियल एरिया डिस्ट्रिक्ट्सि (बीटीएडी) में दो समुदायों के बीच हुए खूनी संघर्ष ने देश को हिला दिया था। ठीक दो सप्ताह के अंतराल से अगस्त, 2012 के प्रारंभ में ही गांधी का भरोसा लेकर हम दसेक लोगों की टोली यहां पहुंची थी। मंजर खतरनाक था, सड़कों पर लाशें तब भी बिछ रही थीं। सबसे खतरनाक थी दहशत, जो हर व्यक्ति, हर परिवार, हर गांव, हर गली, हर संस्था, हर दुकान और हर समुदाय में खम जमाए बैठी थी।

हमारे ड्राइवर ने गाड़ी चलाने से इनकार कर दिया क्योंकि दूसरे समुदाय के राहत-शिविर की दिशा में जाने से उसके प्राणों का खतरा था। सरकारी कर्मचारी शासकीय कार्य के लिए भी अमुक बस्ती की ओर जाती सड़क पर नहीं जाते थे। क्रोध और नफरत ऐसी कि सुशिक्षित महिला नेत्री ने दूसरे समुदाय के अपने विश्वस्त नौकर को यह कहकर निकाल दिया था, ‘अपना चेहरा यहां नहीं दिखाना, वरना मैं तुम्हारी गरदन काट दूंगी।’

दूसरों का डर भगाने के लिए स्वयं निडर होना पड़ता है। उसी निडरता का दीपक लिये हम घूमते रहे, घर-घर, व्यक्ति-व्यक्ति, गांव-गांव और नगर-नगर। ‘साथ बैठो, सभी समुदाय एक साथ आओ, अपना भय भगाओ, आप पीढ़ियों से साथ-साथ रहे हो और एक दिन फिर साथ रहोगे’, हमारे इन शब्दों से अधिक हमारी निर्भयता ने उन पर असर किया।

‘गांव-बूढ़ा’ ने हिम्मत की, विभिन्न समुदायों के ‘गांवबूढ़ा’ निकट आए, केवल दो समुदायों के लोग नहीं, बल्कि विविधतापूर्ण असमी समाज के हर समुदाय के लोग, यानी बोडो, मुस्लिम, राजवंशी, संथाल, राभा, आदिवासी और नेपाली, सब साथ बैठे और इसने उन्हें निर्भय किया। वे बोले, हम पीढ़ियों से एक साथ रहे हैं, हम आज भी विश्वासपूर्वक साथ रहेंगे, किन्हीं दुष्ट तत्त्वों के बरगलाने से अपने पड़ोसी पर हमला नहीं करेंगे। बस हवा बदलने लगी।

धीरे-धीरे शिक्षकों और आचार्यों में यह निर्भयता संक्रमित हुई, वे महीनों से अपने विद्यालयों में अपनी ड्यूटी पर भी नहीं जा पाए थे, अपने सह-शिक्षकों से आंखें मिलाने में उन्हें डर लगता था, पर वे आगे आए। अपने स्वूâल-कॉलेज तथा शिक्षण संस्थान में गांधी की बात सुनने के लिए आयोजन किए, उस निर्भय आत्मा ने शिक्षकों और गुरुजनों में ही नहीं, बल्कि छात्र-छात्राओं में भी उत्साह भर दिया। युवा शिविर में धुबड़ी जिले के एक युवक ने भावपूर्ण शब्दों में कहा, ‘शांति और अहिंसा के इस शिविर में हम आए हैं, कल तक जो एक-दूसरे के सामने नहीं आते थे, डरकर दूर से ही भाग रहे थे, वे आज साथ बैठे हैं, साथ खा रहे हैं, साथ खेल रहे हैं, गा रहे हैं, बात कर रहे हैं, विश्वास नहीं होता, क्या हम वही हैं? नहीं, हम बदल गए हैं।’

ये युवा सचमुच बदल गए हैं, इनके पीछे गुरुजनों का प्रोत्साहन भरा हाथ है, माता-पिता की सहमति है, विभिन्न समुदायों के ये युवा बांहों में बांहें डालें गांधी की कुटी देखने सेवाग्राम जाते हैं, और गांधी की अंतिम जेल-आगा खां पैलेस पूना जाते हैं और इतना अभिप्रेरित होते हैं कि वापस आकर अपने कॉलेज के प्रिंसिपल से आग्रह करते हैं, ‘हम 2 अक्टूबर को गांधी का जन्मदिन मनाएंगे, अपने कॉलेज में अहिंसा दिवस मनाएंगे।’ कई कॉलेजों में ही नहीं, कुछ गांवों में भी ‘अहिंसा दिवस’ का आयोजन ‘अहिंसा पक्ष’ के रूप में आयोजित करके इन युवाओं ने हिंसा के अपयश को ढो रही इस भूमि में अहिंसा का उत्साह भर दिया। दूसरे शांति सद्भावना शिविर में युवाओं ने अपने समाज की सबसे बड़ी समस्या के रूप में हिंसा को चिह्नित किया है, इसका निराकरण क्या हो? इसकी उन्हें खोज है, यह समझ तो उन्होंने टटोल ली है कि हिंसा का जवाब हिंसा नहीं। इसको अपने आसपास के समाज में पैâलाने का निश्चय भी वे कर चुके हैं। कोकराझार का यह क्षेत्र देश भर में अपनी व्रूâर हिंसा के लिए बदनाम हो गया है। इन युवाओं को यह लज्जा का सबब लगता है। यह क्षेत्र अपना यह कलंक धोकर प्रेम का क्षेत्र बने, इस विचार का आकर्षण युवा-मन में स्थान बना रहा है।

क्या यह गांधी का ही करिश्मा नहीं है? क्या यह गांधी का पुनर्जन्म नहीं है? गांधी ने कहा था, ‘मैं अपनी कब्र से भी आवाज दूंगा।’ लगता है, उनकी आत्मा की आवाज इन युवाओं के दिलों में उतर रही है।

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