गांधी और भगत सिंह : तथ्य बोलते हैं

-श्रीभगवान सिंह

आधुनिक भारत की महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक शख्सियतों में भगत सिंह उसी वक्त शुमार हो गये जब 23 मार्च,  1931 को देश की आजादी के लिए उन्होंने हँसते-हँसते फाँसी के फन्दे को चूम लिया। तब से उनके आत्म बलिदान एवं विचारों के महत्त्व को लेकर लगातार लिखा जाता रहा है, हर वर्ष 23 मार्च को देश के विभिन्न नगरों में विचार-गोष्ठियों एवं स्मृति-सभाओं का आयोजन होता रहा है। यह निश्चय ही एक कृतज्ञ राष्ट्र का अपने एक महान शहीद के प्रति कृतज्ञता का प्रमाण है। उनकी जन्मशाताब्दी के अवसर पर भी भगत सिंह की शहादत एवं विचारों को लेकर काफी कुछ लिखा गया जिसे देख कर प्रसन्नता होती है कि हमारे बुद्धिजीवी वर्ग ने भगत सिंह की कुर्बानी को विस्मृत नहीं किया है। इस क्रम में भगत सिंह के विचारों के महत्त्व को काफी उजागर किया गया है। बहुतों ने उन्हें ‘शहीदेआजम’ की संज्ञा से विभूषित किया है, दूसरी तरफ उन्हें माक्र्स एवं गांधी के समतुल्य व्यक्ति के रूप में मूल्यांकित करने के प्रयास भी हुए हैं।

चौबीस वर्ष की उम्र में पहुँचा युवक जहां आम तौर पर यौवन की नैसर्गिक माँग पर गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर स्त्री-सहवास एवं घर-बसाने की इच्छा रखता है, वहां भगत सिंह जैसे युवक ने इस उम्र में पहुंच कर देश की आजादी के लिए फाँसी के फन्दे को अपनी नियति बना लिया। इसके लिए वे निस्संदेह हम सब की दृष्टि में आदर एवं अभिनंदन के पात्र हैं। किन्तु ऐसा करने में भगत सिंह न अकेले थे, न पहले। उनके पहले देश की आजादी के लिए सोलह वर्षीय किशोर खुदीराम बोस, रामप्रसाद बिस्मिल, आशफाक उल्ला खान, रौशन सिंह, राजेन्द्र लाहिड़ी जैसे युवक फाँसी पर लटकाये जा चुके थे। यही नहीं, ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी, जिसके एक सदस्य भगत सिंह भी थे, के ‘मास्टर माइन्ड’ माने जानेवाले चंद्रशेखर आजाद भी उनकी फाँसी के पूर्व ही इलाहाबाद के एक पार्वâ में पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारे जा चुके थे। देश के लिए शहीद होनेवाले इन सभी युवकों का जीवन विवाह एवं रोमांस से अछूता रहा। 23 मार्च, 1931 को भी लाहौर जेल में जब भगत सिंह को फाँसी दी गई, तब उनके साथ फाँसी पर लटकनेवाले राजगुरु एवं सुखदेव जैसे दो और क्रांतिकारी युवक भी थे, यह हमें नहीं भूलना चाहिए। वस्तुत: देश की आजादी के लिए प्राणोत्सर्ग करनेवाले ये सभी शहीद हमारे लिए समान रूप से अभिनंदनीय हैं।

दूसरी बात यह कि भगत सिंह ने क्रांतिकारी साहित्य को पढ़ने एवं उसका प्रचार करने में जितना भी समय लगाया हो, किन्तु उनकी राष्ट्रीय प्रसिद्धि दो कार्यों के कारण ही हुई—पहला कार्य था, चंद्रशेखर आजाद एवं राजगुरु के साथ 17 दिसम्बर, 1928 को लाहौर में पुलिस अफसर सांडर्स ही हत्या करना और दूसरा कार्य था 8 अप्रैल, 1929 को राष्ट्रीय ऐसेम्बली में बटुकेश्वर दत्त के साथ बम पेंâकना। दूसरे कार्य के कारण वे गिरफ्तार हुए और पहले कार्य के कारण वे मृत्युदण्ड के पात्र बने। किन्तु ध्यान में रखने की बात यह है ये दोनों ही कार्य भगत सिंह के व्यक्तिगत निर्णयों की परिणति नहीं थे, हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक आर्मी के निर्णय थे। ‘‘इस आर्मी की स्थापना’’ जैसा कि इतिहासविद विपनचन्द्र ने अपने एक लेख में बताया है, 9-10 सितम्बर, 1928 में विजय सिन्हा, शिव वर्मा, भगवतीचरण वोहरा, भगत सिंह, सुखदेव आदि के प्रयासों से चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में दिल्ली में हुई। ये सभी ऊँचे दर्जे के बौद्धिक थे। चंद्रशेखर आजाद यद्यपि अंग्रेजी कम जानते थे, फिर भी जब कोई बात उन्हें अच्छी तरह समझा दी जाती तभी वे उसे स्वीकार करते थे। ‘बम का दर्शन’ का क्रांतिकारी वक्तव्य भगवतीचरण वोहरा द्वारा आजाद के अनुरोध पर उनके साथ पूरी बहस करने के बाद ही लिखा गया था।’’ (इंडिया स्ट्रगल फॉर इन्डेपेन्डेस, पृ. 255)

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में स्पष्ट है कि भगत सिंह हि. सो. रि. आ. के महत्त्वपूर्ण सदस्यों में एक थे और सांडर्स हत्या से लेकर ऐसेम्बली में बम पेंâकने जैसे कार्यों में उनकी भागीदारी संगठन के नीतिगत पैâसले के तहत थी। गिरफ्तारी के बाद उन्होंने अदालत में भी जो बयान दिया कि ‘यह बम बहरे कानों को सुनाने के लिए पेंâका गया’ संगठन द्वारा ही निर्देशित था।

भगत सिंह के विचारों को प्रकाश में लाने के लिए सर्वश्री जगमोहन एवं चमनलाल द्वारा ‘भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज’ नाम से जो पुस्तक बहुत परिश्रम से तैयार की गई है, उसमें कुछ लेख ही भगत सिंह के नाम से है, कुछ छद्म नाम से लेख है और कुछ महत्त्वपूर्ण लेख हि. सो. रि. आ. के सदस्यों द्वारा सामूहिक रूप से विचार-विमर्श के उपरान्त लिखे गये हैं। दूसरी बात कि भगत सिंह के लेखों में जाति, धर्म आदि के विभेदों से परे, शोषण विहीन समतामूलक समाज के विचार व्यक्त हुए हैं। वस्तुत: रूसी क्रांति की सफलता ने विश्व स्तर पर समाजवादी सिद्धान्तों के प्रति बौद्धिकों को आकृष्ट कर रखा था। जार्ज बर्नाड शा, रोमां रोला, रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसे विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार रूसी क्रांति और वहाँ की समाजवादी उपलब्धियों से अभिभूत थे। लोकमान्य तिलक, ााला लाजपत राय भी जिन्हें आज के सेक्यूलरिष्ट ‘हिन्दूवादी’ सिद्ध करते हैं, रूसी क्रांति के प्रशंसक थे और ब्रिटिश सरकार की निगाह में वे ‘बोल्शेविक एजेन्ट’ समझे जाते थे। ऐसे परिवेश में भगत सिंह एवं उनके युवा साथियों का रूसी क्रांति एवं उनके नायक लेनिन के प्रति आकृष्ट होना, उनसे प्रभावित होना बहुत स्वाभाविक था। भगत सिंह और उनके साथी हिन्दुस्तान में जिस तरह की क्रांति और समाज-निर्माण का सपना देख रहे थे, जो उनके लेखों से पता चलता है, वह पूरी तरह रूसी क्रांति एवं समाजवाद के मॉडल का था, लेकिन उनके विचार माक्र्सवाद या गांधीवाद की तरह समग्र जीवन-दर्शन का रूप नहीं ले पाये थे। भगत सिंह के विचारों में राष्ट्रभाषा का सवाल, स्त्री-समस्या का सवाल, साहित्य-संस्कृति-कला का सवाल, आध्यात्मिक विकास, मनुष्य एवं मनुष्येतर के संबंध का सवाल जैसे कितने ही मुद्दे अनुपस्थित हैं और इसे उनका दोष भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि चौबीस वर्ष की उम्र तक वे जितना सोच सके थे, वही काफी था। विदित है कि गांधी ने अपने चिंतन एवं कर्म में इन सारे विषयों का समावेश किया था।

विचारक के रूप में भगत सिंह के महत्त्व को उजागार करने के लिए उनके लिखे निबंध ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ को बार-बार आज भी प्रकाशित किया जाता है। ध्यान रहे यह लेख भगत सिंह ने जेल में रहते अक्टूबर, 1930 में लिखा था जब वे 23 वर्ष के थे।

बहुतों ने भगत सिंह के महत्त्व को उनके लेख ‘अछूत समस्या’ के आधार पर भी रेखांकित किया है।

जहां तक गांधी के व्यक्तित्व के साथ भगत सिंह की तुलना का प्रश्न है, तो हमें यह बात सदैव ध्यान में रखनी चाहिए कि गांधी ने भले ही कोई नया विचार न दिया हो, जैसा कि वे स्वयं भी कहा करते थे, किन्तु उन्होंने कार्य ऐसे जरूर किये जो मानव इतिहास में नये थे और इस दृष्टि से वे अनेक कार्यों में पहले और अकेले थे। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ खड़े होनेवाले वे प्रथम व्यक्ति थे, तो भारत में 1917 में चम्पारण में किसानों पर हानेवाले जुल्म के खिलाफ सरकारी आदेश की अवज्ञा कर खुद को जेल जाने के लिए प्रस्तुत करनेवाले वे प्रथम भारतीय नेता थे। असहयोग के रूप में पहली बार पूरे देश में राष्ट्रीय आंदोलन खड़ा करने वाले प्रथम नेता गांधी ही थे। और अन्त में साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए गोलियां खाने में भी गांधी अकेले थे।

वस्तुत: भगत सिंह हों या गांधी किसी का भी मूल्यांकन अंधश्रद्धावश नहीं, तथ्यों के आलोक में होना चाहिए। एक के कद को बढ़ाने के लिए दूसरे के कद का छोटा कर देना मूल्यांकन का सही तरीका नहीं है। यह भी विचारणीय है कि भगत सिंह के महत्त्व को बढ़ाने के लिए क्या दूसरे नेताओं, विशेषकर गांधी को अन्यथा सिद्ध करना वांछनीय है?

गालिब का मशहूर शेर है ‘‘जिक्र उस परीवश का और फिर बयां अपना, बन गया रकीब आखिर जो था राजदां अपना।’’ बहुत कुछ ऐसी ही सूरत भगत सिंह के मूल्यांकन—महिमामंडन को लेकर बना दी गई है। भगत सिंह के बहाने उनके भक्त अपने मन की बातें इतना अधिक परोसने लगे हैं जिससे गालिब के इस शेर में इंगित सत्य का अहसास होने लगता है। भगत सिंह को ऊँचा उठाने के क्रम में वे अन्य के कद को इतना छोटा करने लगते हैं जो हर एक समझदार एवं जानकार व्यक्ति को नागवार गुजरने लगता है। गांधी के साथ उनके मतभेदों को उछाल कर वे यहीं सिद्ध करते हैं कि गांधी का मुख्य काम ही था भगत सिंह आदि का विरोध करना और इसलिए यह व्यक्ति भगत सिंह आदि की दृष्टि में बहुत काम का नहीं था। इन आरोपों के पीछे सत्य क्या है, इसे जानकर ही हम दोनों के संबंध में सही राय बना सकते हैं।

सबसे पहले तो हमें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि गांधी का सिर्पâ भगत सिंह से मतभेद नहीं था, मतभेद था तो उन सभी क्रांतिकारियों से जो देश को आजाद कराने के लिए हिंसा एवं आतंक की कार्रवाइयों में विश्वास करते थे एवं उसे अंजाम भी देते थे। यह एक दिलचस्प तथ्य है कि 1920-30 के बीच के जो भी क्रांतिकारी युवक थे, वे सभी मुख्यत: गांधी के असहयोग आंदोलन (1920-22) से ही साम्राज्यवाद विरोध का पाठ पढ़कर क्रांतिकारी बने थे। चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह आदि उस समय चौदह, पन्द्रह वर्ष के किशोर थे। ध्यातव्य है कि 1922 में असहयोग आंदोलन को स्थगित कर गांधी ने अपने को रचनात्मक कार्यक्रम में लगा दिया, तो उस आंदोलन में शामिल हुए इन तरुणों को लगने लगा कि देश की आजादी सिर्फ अहिंसा के रास्ते नहीं प्राप्त हो सकती और उनका झुकाव हिंसात्मक आतंकवादी कार्यों की ओर हो चला। उद्देश्य को साधने के लिए राम प्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ सान्याल आदि ने अक्टूबर, 1924 में हिन्दुस्तान ‘रिपब्लिकन संघ’ की स्थापना की और जब 1924 में काकोरी ट्रेन डवैâती केस में रामप्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्र लाहिड़ी, आशफाक उल्ला की फाँसी हो जाने के बाद संगठन कमजोर हो गया तो 1928 में हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक आर्मी नाम से चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह आदि ने इसकी स्थापना की। इसके संबंध में पहले जिक्र किया जा चुका है। यहां उल्लेख का मतलब यह देखना है कि 1922 के बाद भारत की राजनीति में इन युवा क्रांतिकारी का एक दल अपने ढंग से देश की आजादी की लड़ाई लड़ने और चूँकि इनका ढंग हिंसा का था, इसलिए अहिंसा को अपने जीवन दर्शन का अभिन्न अंग मानने वाले गांधी ने इसे कभी पसंद नहीं किया। गांधी हमेशा कहते रहे कि वे अहिंसा के सवाल को स्वतंत्रता से ज्यादा महत्त्वपूर्ण मानते हैं।

वास्तव में गांधी का इन क्रांतिकारी युवकों से कोई व्यक्तिगत मनोमालिन्य नहीं था। वे इनकी देश भक्ति की भावना की प्रशंसा और सम्मान करते थे, किन्तु अहिंसा में अटूट आस्था के कारण वे इनकी दूसरों की जान लेनेवाली गतिविधियों का विरोध करते थे। ध्यान रहे इसी अहिंसा के जरिये गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ संघर्ष की एक नयी सभ्यता को जन्म दिया था और जब १९१७ में रूस में रक्त रंजित क्रांति का इतिहास रचा जा रहा था, तब ठीक उसी वर्ष गांधी चम्पारण में अहिंसा के जरिये अन्याय प्रतिरोध की एक नयी सभ्यता को जन्म दे रहे थे। विदित है कि 1937-38 में कांग्रेस के अध्यक्ष रहे सुभाषचन्द्र बोस से गांधी के मतभेद का कारण हिंसा बनाम अहिंसा का ही सवाल था। सुभाषचन्द्र सरकार के विरूद्ध कांग्रेस के नेतृत्व में सशस्त्र संघर्ष चलाना चाहते थे जिससे गांधी कभी सहमत नहीं हुए और अन्तत: सुभाष बाबू ने कांग्रेस छोड़ कर केवल नई पार्टी ही नहीं बनाई, बल्कि सशस्त्र संघर्ष को मूर्त रूप देने के लिए जर्मनी और फिर जापान पहुँच गये।

तो गांधी का अपना यह जीवन दर्शन था और इसलिए उन्होंने हिंसा एवं आतंक के मार्ग पर चलने वाले क्रांतिकारियों की देश भक्ति का सम्मान करते हुए भी, उनके साधनों का समर्थन नहीं किया। आज की तारीख में जब हम हिंसा बनाम अहिंसा के प्रश्न पर विचार करते हैं, तो गांधी-मार्ग ही सही सिद्ध होता है। भगत सिंह आदि रूसी क्रांति और रूसी समाजवाद, लेनिनवाद के मॉडल पर भारत में क्रांति करना चाहते थे, लेकिन वह सब आज इतिहास की चीजें बन चुकी हैं, पूँजीवादी उपभोक्तावाद के समक्ष रूसी समाजवाद ने दम तोड़ दिया और चीनी समाजवाद ने पूंजीवाद को अपने अन्दर बसा लिया। विश्व पैमाने पर गांधी के अहिंसा-अपरिग्रह सिद्धान्तों के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है। अतएवं क्रांतिकारियों की हिंसक गतिविधियों का, उनके बम के दर्शन का गांधी द्वारा विरोध किया जाना क्या सही काम नहीं था?

प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि ये क्रांतिकारी भी अपने आखिरी दिनों में यह महसूस करने लगे थे कि उन्होंने हिंसा का मार्ग अपना कर सही काम नहीं किया। इसके प्रमाणस्वरूप जवहरलाल नेहरू की ‘आत्मकथा’ का वह प्रसंग द्रष्टव्य है जब अपनी मौत से चंद दिनों पूर्व ही चन्द्रशेखर आजाद नेहरूजी से उनके इलाहाबाद स्थित आवास पर मिले थे और बात-चीत में यह स्वीकार किया था कि ‘‘वे और उनके साथी अब इस बात के कायल हो चुके हैं कि आतंकवादी तरीके बेकार हैं और इससे कुछ भला होनेवाला नहीं है।… आजाद से यह जानकर मैं बहुत खुश हुआ कि आतंकवाद में विश्वास मर रहा था।’’ विपनचन्द्रा ने भी पूर्वोक्त लेख में इस बात का जिक्र किया है कि २ फरवरी, 1931 को भगत सिंह ने साफ तौर पर कहा कि ‘‘मैं आतंकवादी नहीं हूं सिवा क्रांतिकारी जीवन के आरम्भ में और अब मुझे पूरा विश्वास हो चुका है कि हमलोग उन तरीकों से कुछ भी हासिल नहीं कर सकते।’’ (इंडिया स्ट्रगल फॉर फ्रीडम, पृष्ठ 255) इन क्रांतिकारियों की इन आत्म स्वीकृतियों के बावजूद गांधी को इनके साधनों का विरोध करने के लिए लांछित करने के पीछे तथ्यों का कितना बल है, इसे सहज ही देखा-समझा जा सकता है।

भगत सिंह को लेकर गांधी पर जो सबसे बड़ा आरोप रहा है वह यह कि उन्होंने भगत सिंह एवं उनके दो साथियों को फाँसी की सजा से बचाने के लिए अपने प्रभाव का जरा भी इस्तेमाल नहीं किया। 23 मार्च, 1931 को जब इन्हें फाँसी दी गई, उसके कुछ ही दिनों पूर्व यानी 5 मार्च को ही गांधी और वायसराय इर्विन के बीच वह प्रसिद्ध समझौता सम्पन्न हुआ था जिसके अनुसार 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान गिरफ्तार किये गये लाखों सत्याग्रहियों को जेल से छोड़ा गया था। अतएवं तब से लेकर अब तक गांधी पर भगत सिंह के कातिल होने का आरोप भगत सिंह प्रेमी लगाते रहे हैं। लेकिन सत्य इसके विपरीत है। गांधी ने काफी प्रयास किये थे कि इनके मृत्युदण्ड को किसी और सजा में रूपान्तरित कर दिया जाए। समझौते के दौरान भी गांधी बहुत कठिनाई से वायसराय से इस मसले पर पुन: विचार करने का अनुरोध कर सके थे, किन्तु जैसा कि नेहरू ने ‘आत्म कथा’ में लिखा है, सरकार ने उनके अनुरोध को अस्वीकृत कर दिया।

इसके बाद भी गांधी चुप नहीं बैठे रहे। 24 मार्च को सुबह में फाँसी दी जानी थी, सो गांधी उस समय दिल्ली में ही थे, वायसराय को 23 मार्च को पत्र लिख कर पुन: इस सवाल पर विचार करने का अनुरोध किया। उस पत्र के कुछ अंश देखने लायक हैं—‘‘प्रिय मित्र, आपको यह पत्र लिखना आपके प्रति व्रूâरता करने जैसा लगता है, पर शांति के लिए अन्तिम अपील करना आवश्यक है। यद्यपि आपने मुझे साफ-साफ बता दिया था कि भगत सिंह और अन्य दो लोगों की मौत की सजा में कोई रियायत किये जाने की आशा नहीं है, फिर भी आपने मेरे शनिवार के निवेदन पर विचार करने को कहा था।… यदि इस पर पुन: विचार करने की गुँजाइस हो, तो मैं आपका ध्यान निम्न बातों की ओर दिलाना चाहता हूं। जनमत, वह सही या गलत, सजा में रियायत चाहता है। जब कोई सिद्धान्त दाँव पर न हो तो लोकमत का मान करना हमारा कर्तव्य हो जाता है। प्रस्तुत मामले में

स्थिति ऐसी है कि यदि सजा हल्की की जाती है, तो बहुत संभव है कि आन्तरिक शान्ति की स्थापना में सहायता मिले। यदि मौत की सजा दी गई तो निस्संदेह शान्ति खतरे में पड़ जायेगी। मैं आपको यह सूचित कर सकता हूं कि क्रांतिकारी दल ने मुझे यह आश्वासन दिया है कि यदि इन लोगों की जान बख्श दी जाये तो यह दल अपनी कार्यवाहियां बंद कर देगा। यह देखते हुए मेरी राय में मौत की सजा को क्रांतिकारियों द्वारा होनेवाली हत्याएं जब तक बंद रहती हैं, तब तक तो मुल्तवी कर देना एक लाजमी फर्ज बन जाता है।’’

पत्र और लम्बा है, स्थानाभाव के कारण यहां इतना ही अंश दे पाना संभव है। फिर भी जो अंश है, उससे साफ है कि गांधी अन्त-अन्त तक सच्चे मन से फाँसी की सजा को बदलवाने के लिए प्रयत्नशील थे। लेकिन उनकी अपील का कोई असर नहीं हुआ, उल्टे फाँसी के तय समय में ग्यारह घंटे की कमी करते हुए 23 मार्च की शाम सात बजे ही भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव को फाँसी दे दी गई। उन्हें फाँसी दिये जाने के बाद गांधी ने जो वक्तव्य जारी किया, वह भी इन क्रांतिकारियों के संबंध में उनकी भावनाओं को समझने में काफी महत्त्वपूर्ण है ‘‘भगत सिंह और उनके साथी फाँसी पाकर शहीद बन गये हैं। ऐसा लगता है मानो उनकी मृत्यु से हजारों लोगों की निजी हानि हुई है। इन नवयुवक देशभक्तों की याद में प्रशंसा के जो शब्द कहे जा सकते हैं, मैं उनके साथ हूं।…सरकार के बारे में मुझे ऐसा लगे बिना नहीं रहता कि उसने क्रांतिकारी पक्ष को अपने पक्ष में करने का सुनहरा अवसर गँवा दिया है। समझौते को दृष्टि में रख कर और कुछ नहीं तो फाँसी की सजा को अनिश्चित काल तक अमल में न लाना उसका फर्ज था। सरकार ने अपने काम से समझौते को बड़ा धक्का पहुँचाया है और एक बार फिर लोकमत को ठुकराने और अपने अपरिमित पशु-बल के प्रदर्शन की शक्ति को साबित किया है।’’

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में दिन के उजाले की तरह साफ है कि भगत सिंह आदि की सजा में कमी करने के संबंध में गांधी की वायसराय से बातें हुई थीं और वायसराय ने उस पर विचार करने का आश्वासन भी दिया था। गांधी अन्त-अन्त तक वायसराय से मिल कर इस मुद्दे पर बात करने को व्यग्र थे जो वायसराय को मान्य नहीं हुआ। दूसरी बात जो अत्यन्त महत्त्व की है यह कि चाहे चम्पारण-सत्याग्रह का मामला हो या असहयोग आंदोलन का, गांधी पर जब मुकदमें चलाये गये तो उन्होंने हमेशा अपने लिए कठोर से कठोर दण्ड की मांग की थी। अपने इस स्वभाव के विरूद्ध जाकर वे वायसराय से इन क्रांतिकारियों की सजा कम करने की प्रार्थना कर रहे थे, तो इसे इन क्रांतिकारियों के प्रति उनकी गहरी सहृदयता, संवेदनशीलता का ही प्रमाण समझा जाना चाहिए। फाँसी दिये जाने के बाद उनके द्वारा दिये वक्तव्य से भी स्पष्ट है कि वे सरकार के पशु बल प्रदर्शन से कितने मर्माहत थे।

इसके बावजूद यह प्रलाप करना कि गांधी चाहते, तो फाँसी की सजा से उन्हें बचा ही लेते, उस समय के शासन के दमनकारी चरित्र के प्रति अज्ञान प्रकट करना ही कहा जायेगा। अगर अंग्रेज गांधी की हर बात मान लेते, तब तो उन्हें 1920 के असहयोग आंदोलन के समय ही यहां से चले जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा मुमकिन नहीं हुआ और गांधी को 1942 तक आंदोलन करते रहना पड़ा, औरों के साथ-साथ उन्हें भी जेल जाते रहना पड़ा। गांधी को कमजोर करने के लिए अंग्रेजों ने कैसे मुसलिम लीग, हिन्दू महासभा जैसे साम्प्रदायिक संगठनों, जिन्ना एवं आम्बेडकर जैसे नेताओं को प्रोत्साहित किया, जैसी बातों को ध्यान में रखने पर गांधी की मजबूरी का भी पता चल जाता है। ब्रिटिश शासन की निर्ममता का जो इतिहास था, उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है कि इन क्रांतिकारियों को बचाने के लिए ईसा मसीह भी आकर प्रार्थना करते तो उसका भी कोई प्रभाव नहीं होता।

कुल मिला कर यही कहा जा सकता है कि भगत सिंह आदि के महत्त्व को उजागर करने के लिए जिस तरह गांधी की लांछित छवि प्रस्तुत की जाती है, उसका मुख्य कारण सही जानकारी का तो अभाव है, भगत सिंह के जिक्र के बहाने उनके भक्तों की गांधी के प्रति नासमझी भरी भड़ास भी है और यह वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन का सबसे बड़ा दुश्मन है।

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