विकास की दिशा और विकल्प

–  सच्चिदानंद सिन्हा

विकास की वर्तमान दिशा सिर्फ आर्थिक नीतियों का परिणाम नहीं बल्कि एक खास तरह की दृष्टि और आधुनिक औद्योगिक सभ्यता के केंद्रीय मूल्यों के परिणाम है, जो आर्थिक नीतियों के पीछे भी हैं। यों तो ये एक मूल्य व्यापारिक हैं, लेकिन इनकी शक्ति का स्त्रोत एक व्यापक विश्वदृष्टि है। इस दृष्टि को बनाने में अनेक वैचारिक धाराओं का योगदान रहा है, लेकिन इसे साफ तौर से अभिव्यक्ति और आधार मिला मार्क्स और डारविन के सिद्धांतों से।

इस वैचारिक युग (मार्क्स-डारविन युग) की शुरुआत 1948 में मार्क्स-एगेल्स के ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ के प्रकाशन से मानी जा सकती है। इस घोषणापत्र में मानव समाज को अनिवार्य रूप से विकासशील माना गया है और यह कहा गया है कि उनकी परिणति ‘कम्युनिज्म’ की स्थापना से होगी। इस विचार के अनुसार कम्युनिज्म के पहले मानव समाज के विकास को वर्गो के द्वंद्व से ऊर्जा मिलती आ रही है क्योंकि विकास द्वंद्वात्मक होता है। कम्युनिज्म के स्थापना के बाद मानव समुहों का आपसी द्वंद्व समाप्त हो जायेगा और विकास की ऊर्जा मनुष्य और प्रकृति के संघर्ष से मिलेगी। इस विकासवादी सिद्धांत को ‘कम्युनिष्ट घोषणापत्र’ के प्रकाशन के एक दशक के भीतर प्रकाशित डारविन के विकासवाद के सिद्धांत से भारी बल मिला। इस सिद्धांत के अनुसार प्रकृति की विभिन्न प्रजातियों में अपने को अस्तित्व में रखने के लिए अनवरत होड़ रही है और इसमें मनुष्य अन्य जीवों की अपेक्षा परिवेश के अनुकुल बनने को अपनी क्षमता के बल पर विकास की चोटी पर स्थापित हो गया है। कुछ विचारकों ने इस प्रक्रिया को ‘अधिकतम सक्षम के जीवित बचने के सिद्धान्त’ (सरवाइवल आफ द फिटेस्ट) के रूप में देखा।

इस तरह यूरोप के नवोदित पूंजीवादी समाज की औद्योगिक होड़ भी अस्तित्व की होड़ के पहलू के रूप में देखी जाने लगी। इस दृष्टि का एक अतिवादी रूप फासीवाद था. जो श्रेष्ठ मनुष्यों द्वारा निम्न कोटि के मनुष्यों पर शासन और उनका शोषण आवश्यक मानता था। इसी दृष्टि की एक अभिव्यक्ति यह भी थी कि अपनी सक्षमता के कारण आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था और पश्चिमी सभ्यता सभी परंपरागत सभ्यताओं और अर्थ व्यवस्थाओं को नष्ट कर देगी और उन्हें अपने सांचे में ढाल देगी।

मार्क्स ने बड़े स्पष्ट रूप से इस प्रक्रिया को बाकी समाजों के विकास के लिए अवश्यम्भावी माना था। इस विचारधारा से औपनिवेशिक शोषण को परोक्ष समर्थन भी मिलता रहा। प्रछन्न रूप से सभी पश्चिमी समाजों में यह दृष्टि रंगभेद की नीति के रूप में मौजूद है।

ऐसे में कुल मिलाकर जो युगदृष्टि बनी और जिसे आधुनिकता का आधार माना जाता रहा है, उसके अनुसार मनुष्य निरंतर भौतिक रूप से आरोहण के पथ पर है और इस आरोहण में यह लगातार प्रकृति की शक्तियों पर विजय प्राप्त कर अपनी समृद्धि का विस्तार कर रहा है और समृद्धि का यह विस्तार सीमाहीन है। ठोस रूप में यह समृद्धि उपभोग की नयी वस्तुओं का आविष्कार करने और उनका अम्बार लगाने में है। अर्थशास्त्री (जिन पर यह वैचारिक माहौल हावी था) उत्पादन पर सीमा के दो ही कारण मानते थे—पूंजी या श्रम का अभाव। लेकिन इन दोनों का विस्तार जरुरत के अनुसार हो सकता था। एक सीमा अगर लग सकती थी तो वह बाजार के अभाव से ही लग सकती थी।

लेकिन समाजवादी अर्थशास्त्रियों के दृष्टि में बाजार का अभाव पूंजीवाद आर्थिक प्रणाली का परिणाम है और उसे राष्ट्रीयकरण और नियोजन से दूर किया जा सकता है।

लगभग डेढ़ सौ साल से अर्थशास्त्री बाजार के सिकुड़न और फैलाव (ट्रेड साइकिल) के कारणों को लेकर विवाद करते रहे हैं। लेकिन प्रकृतिक संसाधनों का अभाव भी औद्योगिक विकास पर कोई सीमा लगा सकता है, यह अर्थशास्त्र का मुद्दा कभी नहीं बना। यह बात कुछ अचरज में डालने वाली है क्योंकि यह सामान्य बुद्धि की बात है कि प्रकृति में उपलब्ध सीमित सांसाधनों के बल पर असीमित मात्रा में उपयोग की वस्तुओं का उत्पादन असंभव है। लेकिन पिछली दो सदियों में जिस पैमाने पर औद्योगिक विकास संभव हुआ था, उसकों शाश्वत मान लेने का आग्रह इतना जबरदस्त था कि अर्थशास्त्रियों के लिए दूसरी संभवनाओं की कल्पना करना भी मुश्किल था।

हां, इस विकास की दिशा और गति पर प्रश्न लगाना मुश्किल भी था क्योंकि इस विकास से समाज के शक्तिशाली वर्गो का स्वार्थ भी जुड़ा हुआ था। इन वर्गो का विकास सीधे आधुनिक उद्योगों के ढांचे से जुड़ा हुआ है।

आधुनिक उद्योगों के ढांचे में ही गैरबराबरी और स्तरों में विभाजन (हाइआर्की) निहित है। आधुनिक उद्योंगों की उत्पादन पद्धति और प्रबन्धन का आकार एक पिरामिड की तरह होता है। इनमें निचले स्तरों पर श्रम ज्यादा होता है। उत्पादन प्रक्रिया जैसे-जैसे आगे बढ़ती है वैसे-वैसे शुरूआती अनगढ़ पुर्जे अधगढ़ होते जाते हैं और इनके संयोजन से जटिल मशीन या वस्तु की निर्मिति होती हैं। उत्पादन के अंतिम चरण पहुंचते-पहुंचते हम अति जटिल और पूरी तरह तैयार मशीन या वस्तु पाते है। उत्पादन के विभिन्न स्तरों पर नीचे से ऊपर की ओर बढ़ते हुए श्रम की अधिक दक्ष और शीर्ष स्थानों पर दक्ष होकर तकनीकि विशेषता का रूप ग्रहण कर लेता है। इसी के समानान्तर प्रबन्धन भी जटिल होता जाता है।

चूंकि निचले स्तरों का श्रम किसी शारीरिक क्रिया के बार-बार दुहराने वाला होता है, आवश्यकता के अनुसार इन स्तरों पर श्रमिकों का काम स्वचालित यंत्रों को लगाकर कराया जा सकता है। शीर्ष स्थानों पर ही तकनीकि विशेषज्ञों और प्रबंधकों के सामने उत्पादन प्रक्रिया, बाजार की स्थिति, आपूर्ति और बिक्री की पूरी जानकारी होती है। इस तरह दक्ष श्रमिकों और तकनीक तथा प्रबधंन विशेषज्ञों के काम की जानकारी उद्योगों के लिए अपरिहार्य होती है। इस कारण औद्योगिक व्यवस्था में असली शक्ति विशेषज्ञों के समूह के हाथ होती है। उनकी अनिवार्यता और शक्ति के अनुपात में ही औद्योगिक ढांचे के अलग-अलग स्तरों पर काम करने वाले की आय और सुविधाएं भी होती हैं।

आधुनिक उद्योगों के ढांचे में निहित विषमता की समझ के अभाव के कारण समाजवादियों में यह विचार फैल रहा है कि आधुनिक औद्योगिक समाज की विषमता सिर्फ निजी स्वामित्व के कारण है। एक बार उद्योगों का सामित्व समाज के हाथ में आ जायेगा तो विषमता स्वयं मिट जायेगी। लेकिन हमारे अपने देश में सरकारी क्षेत्रों के उद्योगों में फैली घोर विषमता और स्वयं चीन, रूस जैसे देशों में, जो अपने को समाजवादी कहते रहे हैं, आय और सुविधाओं की गैरबराबरी इस विचार को झुठला रही है। समाजवादी कहे जाने वाले देशों में विकास और औद्योगिक क्षमता के वे ही प्रतिमान अपनाये जा रहे है जो पूंजीवादी देशों के है। यह उद्योगों के चरित्र के अनुरूप व्यवहार की विवशता है। इसके बगैर आधुनिक उद्योग अपनी पूर्ण क्षमता में काम नहीं कर सकते।[1]

इस सिलसिले में एक बात पर विचार करना जरूरी है, जिसे मार्क्स के बाद के समादवादी विचारकों द्वारा नजरअंदाज कर दिया गया था। मार्क्स ने वर्तमान औद्योगिक प्रक्रिया में निहित बेगानेपन (एलिअनेशन) की समस्या को अत्यधिक महत्त्व का बतलाया था। उसने बताया था कि इस बेगानेपन की समस्या का कारण श्रमिकों का उत्पादन प्रक्रिया के साथ कोई वैसा भावात्मक लगाव नहीं होना है, जैसा पहले के उद्योगों में उत्पादन प्रक्रिया के साथ होता था। इस प्रकार श्रमिक का श्रम उसकी अपनी सृजनशीलता से कट कर अलग हो जाता है और उसका काम (श्रम) बिल्कुल उबाऊ हो जाता है लेकिन मार्क्स ने यह नहीं बतलाया कि इस समस्या का समाधान कैसे होगा।

मार्क्स के बाद तो उद्योगों का ढांचा उत्तरोत्तर ऐसा ही होता गया है, जहां श्रमिकों को अपने श्रम के प्रति कोई निजत्व का भाव नहीं होता। बल्कि अब तो यह हो रहा है कि औद्योगिक प्रक्रिया की बढ़ती जटिलता के कारण इसमें उपयोगी होने के लिए आवश्यक योग्यता हासिल करने की असमर्थता के कारण दिनोंदिन वैसे लोगां की संख्या बढती जा रही है, जो न सिर्फ बेरोजगार हो रहे हैं बल्कि नये तरह के रोजगार के लिए स्थायी रूप से अयोग्य भी बनते जा रहे हैं। चूंकि तकनीक का आधुनिकीकरण जीवन के सभी क्षेत्रों में फैलता हैं, यंत्रीकरण की यह प्रक्रिया सिर्फ उद्योगों में ही नहीं सेवा के क्षेत्रों – जैसे बैंक, होटल, अस्पताल,यातायात आदि – में भी होती है। इससे यह अयोग्यता भी रोजगार के सभी क्षेत्रों के लिए होती है।

आधुनिक औद्योगिक समाज की जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रशिक्षण एक आयामी होता है, जिसमें वर्षो तकनीकी ज्ञान के लिए घोर प्रतिस्पर्धा के वातावरण में दिमागी ड्रिल (कवायद) करवाई जाती है । इसमें जो थोड़े से लोग सफल हो पाते हैं, उनके लिए संतोषदायक काम और जीवन की सुविधाओं के रास्ते खुल जाते हैं । बाकी लोग सरकारी अनुदान पर जीवित रहने को विवश होते हैं। वे ऐसे महत्त्वहीन कामो में लगा दिये जाते हैं, जिनमें किसी कौशल या भावनात्मक तुष्टि की गुंजाइश नहीं होती।

इस तरह यंत्रीकरण और कंप्यूटरों के बढ़ते प्रयोग के साथ-साथ न सिर्फ रोजगार की संभावना सीमित होती जा रही है बल्कि काम करने लायक श्रमिकों का एक बड़ा हिस्सा समाज के लिए फालतू और अप्रासंगिक बनता जा रहा है । जो लोग इस तरह समाज के लिए अप्रासंगिक हो रहे हैं, वे लोग संपत्ति के स्वर्ग अमेरिका में भी नारकीय जीवन बिताने को विवश हैं और वहां ऐसे लोगों की संख्या 10 से 15 प्रतिशत है।

पिछले दशक में तेज औद्योगिक विकास और शास्त्रास्त्र तथा उपभोग की वस्तुओं के विशाल पैमाने पर उत्पादन के बावजूद इंग्लैंड से 13-14 प्रतिशत,जर्मनी में 6 प्रतिशत, फ्रांस में 10-11 प्रतिशत, अमेरिका में 6-7 प्रतिशत और जापान में भी 5 प्रतिशत के आस-पास काम करने लायक लोग बेरोजगार हो रहे थे।[2] इस दशक की मंदी ने इस रफ्तार को और तेज किया है। अगर हम इस संख्या में फौज में भर्ती लोगों को जोड़ दे तो बेरोजगारी की स्थिति और भी विषम दिखाई देगी। पूर्व कम्यूनिस्ट देशों का तो सारा कुछ चौपट हो गया है और वहां आज बेरोजगारी कितनी है, उसे मापने में कोई भी पैमाना कारगर नहीं हो सकता।

भारत समेत तीसरी दुनिया में इस औद्योगिक अर्थव्यवस्था के कारण मानव श्रम का तिरस्कार हो रहा है और कीमती आयातित मशीनों और तकनीकी ज्ञान पर बेशुमार खर्च हो रहा है। इसके कारण संपन्नता के कुछ द्वीप बन रहे हैं और देश के बाकी भूभागों का वैसा ही औपनिवेशिक शोषण हो रहा है, जैसा पश्चिमी पूंजीवादी देशों द्वारा दुनिया भर में फैले उनके उपनिवेशों का होता था।

इस प्रक्रिया से कच्चे माल और ऊर्जा के लिए देश के जंगल अंधाधुंध कट रहे हैं और खनिज क्षेत्रों को खदानों का बीहड़ बनाया जा रहा है। इन क्षेत्रों में रहने वाले लोग, जिनमें ज्यादा संख्या आदिवासियों की है अपनी आंखों के सामने बेबसी से अपने पारम्परिक जीवन के आधार को नष्ट होते देख रहे हैं। इसी तरह जल-विद्युत् और सिंचाई के लिए विशाल बांध बनाये जा रहे हैं, जिससे जंगल डूब रहे हैं और उनमें रहने वाले मनुष्य और पशु विस्थापित हो रहे हैं।

उद्योगों को सस्ता कच्चा माल देने और मजदूरी कम रखने के लिए अनाज का भाव कम रखा जाता है। इनसे होने वाले कृषि के शोषण के फलस्वरूप ग्रामीण अर्थव्यवस्था नष्ट हो रही है और लोग गांव छोड़कर जीविका की तलाश में नगरों की गंदी बस्तियों की आबादी बढ़ा रहे है।[3]

औद्योगिक जरूरतों की पूर्ति के लिए तेजी से कृषि का व्यवसायीकरण हो रहा है। इससे आत्मनिर्भर गांव कुछ खास तरह की कृषिजन्य वस्तुओं के विक्रेता बन कर उद्योगों पर निर्भर हो रहे हैं। इसके अलावा नयी कृषि के चलते अब बीज,उर्वरक और कीटनाशक दवाओं के लिए वे देशी इजारेदारों और विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर निर्भर होते जा रहे हैं। औद्योगिक वस्तुओं और कृषिजन्य वस्तुओं की कीमतों का ऐसा अनुपात बना रहता है कि नयी कृषि की बढ़ती उत्पादकता के बावजूद उसका फायदा किसानों को नही मिलता और कृषि क्षेत्र की कर्जदारी दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। लेकिन तीसरी दुनिया के लोग यह भ्रम पाले हुए हैं कि इस विकास के माध्यम से वे भी एक दिन विकसित औद्योगिक देशों के समकक्ष हो जायेंगे। यह बात शायद ही किसी के दिमाग में आती है कि पश्चिमी देशों की वर्त्तमान समृद्धि को लाने में संसार के संसाधनों का शोषण हुआ था और समृद्धि को बनाये रखने के लिए आज भी परोक्ष रूप से सारे संसार के संसाधनों का बड़े पैमाने पर शोषण जारी है।

लोगों की समझ में यह बात क्यों नहीं आती, इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि वह वर्ग, जो देश के लिए सोचता है और देश की मानसिकता बनाता है खुद सुविधाभोगी है। वह तो गरीब देशों के भीतर के संपन्नता के द्वीपों का हिस्सा है, और अपने देशों की बहुसंख्यक आबादी का शोषण कर आज भी वैसी सुविधाओं का हिस्सेदार है, जो संपन्न औद्योगिक देशों के मध्यम वर्ग को उपलब्ध हैं।

इस तरह हम देखते हैं कि गांवों से, खनिज क्षेत्रों से और वन प्रान्तों से विपरीत दिशाओं में चलने वाले विकास के दो रास्ते फूट रहे हैं। एक रास्ता इन क्षेत्रों की सम्पदा का अपहरण कर नगरों के संपन्न इलाके बना रहा है, जिनमें मुट्टी भर लोग मौजमस्ती की जिंदगी बिताते हैं और दूसरा रास्ता इन क्षेत्रों के लोगों की जीविका के आधार को नष्ट कर उन्हें नगरों की धूल फांकने के लिए ले जाता है। दोनों रास्ते एक-दूसरे से मिलते हैं और वे एक दूसरे के पूरक हैं : बहुसंख्यक लोगों की विपन्नता से थोड़े से लोग संपन्न बन रहे हैं। इन क्षेत्रों के विस्थापित लोग सड़क बनाने, ईट की भट्टियों में मजदूरी करने, बोझा ढोने, ते रिक्शा चलाने, मकान बनाने की दिहाड़ी मजदूरी करने, घरों में झाडू-पोंछा का काम करने के लिए नगरों की गंदी बस्तियों में कीड़ों की जिदगी जीने को मजबूर होते हैं। आधुनिक औद्योगिक विकास का सज्जबाग देखने या दिखाने वाले लोग वे हैं जो विकास के पहले रास्ते से संपन्नता के मजे ले चुके हैं। दूसरे रास्ते की जिंदगी, जो भारी बहुसंख्यक की जिंदगी है, उनके लिए एक बंद दुनिया है, जिसका एहसास उन्हें भयानक त्रासदी का कोई झटका ही दिला सकता है।

पूरे देश को लें तो यह दिखाई देता है कि इस विकास से यह औद्योगिक देशों पर दिनोंदिन अधिक निर्भर हो कर घोर कर्जदारी में डूब रहा है। अब तक भारत पर विदेशी कर्ज करीब चार लाख करोड़ हो गया है और यह स्थिति बन रही है कि नया मिलने वाला कर्ज पुराने कर्जो श्री अदायगी की किस्तें देने के लिए भी काफी नहीं होगा।

अपनी निहित गैरबराबरी, बेगानेपन और मनुष्यों के एक बड़े हिस्से को अप्रासंगिक बनाने की अमानुषिकता के बावजूद वर्तमान सभ्यता ने लोगों को उपभोक्तावादी होड़ की जंजीर में ऐसा जकड़ रखा है कि अगर वह एस्केलेटर, जिसकी चर्चा पहले की गयी है, निरंतर ऊपर की तरफ चलता रहे तो लोग ऊपर चढ़ने की संभावना की आशा में इस सभ्यता का मोह नहीं छोड़ेंगे। लेकिन इस एस्केलेटर के निरंतर ऊपर चढ़ते या चढ़ते रहने के लिए यह जरूरी है कि वस्तुओं और सेवाओं का सीमाहीन विस्तार होता रहे। ऐसे सीमाहीन विस्तार का मिथक आधुनिक सभ्यता का आवश्यक अंग है। इस विस्तार पर सीमा की कल्पना तक नहीं हुई जब तक यह माना जाता रहा कि प्राकृतिक संसाधनों का अभाव उत्पादन पर कोई सीमा नहीं लगा पायेगा। लेकिन पिछले दो दशकों की कुछ घटनाओं से यह मोहभंग होने लगा है और इसी के साथ मार्क्स-डारविन युग का सुखस्वप्न भी (जिस पर अधुनिक सभ्यता टिकी रही है) भंग होता दिखाई देता है ।

साठ के दशक में ‘लिमिट्स आफ ग्रोथ’ नाम से प्रसारित एक रपट (जिसे ‘क्लब आफ रोम’ के नाम से विख्यात उद्योगपतियों और तकनीकी विशेषज्ञों के एक समूह ने तैयार किया था) और अब पृथ्वी सम्मेलन जैसे आयोजनों के मार्फत इस संभावना की ओर इशारा किया जाने लगा है कि ऊर्जा के पारंपरिक स्रोतों के सूखने, संसाधनों के अभाव तथा प्रदूषण आदि के कारण वर्तमान उत्पादन का सिलसिला सिर्फ 2020 ई. तक ऊपर की ओर चलेगा और उसके बाद नीचे गिरेगा और जीवनस्तर वहीं पहुंच जायेगा जहां वह 1930 ई. में था।

तमाम ऊपरी आशावादिता के बावजूद अब मौजूदा विकास की संभावनाओं के प्रति गहरा संशय छाने लगा है। आज दुनिया के अधिकांश चिंतक और वैज्ञानिक इस बात की चेतावनी दे रहे हैं कि विकास का वर्तमान रास्ता विनाश की ओर ले जाने वाला है। मौजूदा औद्योगिक ढांचे को चलाने वाले लोग भी प्राकृतिक परिवेश के संरक्षण और पर्यावरण के संतुलन की बात करने लगे हैं, भले ही उनके काम इस भावना के विपरीत पड़ते हों। विचारों में यह परिवर्तन एक नये युग के आगमन का सूचक है। इस तरह कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र के प्रकाशन के डेढ़ सौ साल बाद हम एक नये युग का जन्म देख रहे हैं, जिसे हम सुविधा के लिए गांधी का युग कह सकते हैं।

इस युग (गांधी युग) के साथ अलग तरह की विश्वदृष्टि जुड़ी है। इसमें मनुष्य की नियति प्रकृति पर या वनस्पति जगत् समेत अन्य प्राणियों पर विजय प्राप्त करना नहीं, उनके साथ एक नये तरह का तादात्म्य स्थापित करना है। आज पर्यावरण की सुरक्षा, जो अन्य जीवों और वनों की रक्षा से जुड़ी है, मानव प्रजाति के स्वयं जीवित रहने की अनिवार्य शर्त दिखाई देने लगी है। पर्यावरण के संतुलन को बनाये रखने के लिए विकास के लक्ष्य को बिल्कुल बदल देना जरुरी देखाई देता है।

इस दृष्टि में आदमी की जरूरतों का बढ़ाने और इसके लिए उपभोग की वस्तुओं के असीम विस्तार की जगह आत्म-नियंत्रण पर बल दिया जाता है,वस्तुओं का उत्पादन वही तक हो, जितना मनुष्य के शारीरिक और आध्यात्मिक विकास के लिए जिरूरी है—उपभोग का ऐसा स्तर जो न इतना कम हो कि अभाव से आक्रान्त मनुष्य की सारी ऊर्जा आवश्यक उपभोग की वस्तुएं जुटाने में ही लग जाए और ना ही इतना ज्यादा कि वस्तुओं का अंबार लगाने में ही मनुष्य का सारा कार्यकाल और कल्पना खत्म हो जाए। यह दूसरी स्थिति वर्तमान उपभोक्तावादी संस्कृति की है, जहां फ्रिज, मोटरगाड़ी, वाशिंग मशीन, वैक्यूम क्लीनर और बीसियों अन्य उपकरण समय बचाने के लिए जुटाये जाते हैं पर जिन्हें जुटाने के लिए सारी जिन्दगी काम करने और धेला-धेला जोड़ने में लगा दी जाती है। और जो थोड़ा अवकाश काम के बाहर मिलता है वह इनके ररव-ररवाव, मरम्मत और खरीदगी में चला जाता है। यह भी पशु की जिन्दगी है, जहां आदमी भौतिक जरूरत से ऊपर उठकर चेतना के जीवन में प्रदेश नहीं कर पाता।

इस नयी दृष्टि के साथ समता का सिद्धांत भी अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। जैसा कि हमने ऊपर देखा, आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था के लिए गैरबराबरी और स्तरों में विभाजन जुडे हैं। इसी से अर्थिक एस्केलेटर की निचली सीढ़ियों पर अवस्थित लोगों के लिए ऊपर की ओर आरोहण भी जरूरी हो जाता है। निचले वर्गो के लोगों को इसी आरोहण की आशा में अपनी स्थिति से संतुष्ट रखा जा सकता है। लेकिन उत्पादन के अनियंत्रित विस्तार के रुकने का मतलब है एस्केलेटर का बंद हो जाना। इसमें असंतोष और सामाजिक विस्फोट के बीज हैं। एक समता मूलक समाज में ही यह संभव होगा कि लोग जरूरी वस्तुओं से ही संतुष्ट रह सकें, क्योंकि किसी के पास वैसी गैरजरूरी वस्तुओं का अम्बार नहीं होगा, जिन्हें पाने के लिए लोग लालायित होकर होड़ में लग जाते हैं। इस तरह पर्यावरण संतुलन के लिए यानी औद्योगिक उत्पादनके विध्वंसकारी रूप को नियंत्रित्त करने के लिए भी समतामूलक समाज की स्थापना अनिवार्य है।

गांधी का नाम इस नयी विश्वदृष्टि के साथ के साथ जोड़ा गया है क्योंकि गांधी ने इस सदी के प्रारंभ में ही स्पष्ट शब्दों में ‘शैतानी सभ्यता’ कह कर भौतिक वस्तुओं को कंन्द्र में रखने वाली वर्तमान पश्चिमी सभ्यता का निषेध किया था। लेकिन गांधी के पहले और बाद भी अनेक चिंतक और आंदोलन हुए है, जिन्होंने इस नयी चेतना को जन्म देने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। इनमें स्वयं गांधी को प्रेरणा देने वाले रस्किन, तालस्ताय, थोरो आदि हैं।

एक महत्वपूर्ण चिंतक प्रिंस क्रोपाटकिन (जिनका नाम अराजकतावादियों के साथ जोड़ा जाता है) का विचार भी इस चेतना का महत्वपूर्ण अंग है। प्रिंस क्रोपाटकिन ने ‘पारस्परिक सहायता’ नामक अपनी पुस्तक में जीवों के और मानव समाज के विकास में भी संघर्ष के बजाय पारस्परिक सहयोग को अधिक महत्वपूर्ण माना। अब बहुत से वैज्ञानिक, जो जीवों के आचार-व्यवहार का अध्ययन करते है (एथोलॉजिस्ट), इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि अनेक जीव स्वभाव से न सिर्फ अपनी प्रजाति के सदस्यों साथ सहयोग करते हैं बल्कि दूसरी प्रजातियों के साथ भी इस तरह का सहयोग करते हैं, जो पारस्परिक रूप से उनके अस्तित्व के लिए अपरिहार्य होता है।

इसी तरह ई. एफ. शुमांखर ने श्रमबहुल तकनीकी पर जोर देकर अर्थशास्त्र के क्षेत्र में नयी दिशा देने की कोशिश की और 1973 में (जो वैचारिक संक्रमणकाल भी था) ‘स्माल इज ब्यूटिफुल’ नामक पुस्तक में मध्यम ढंग की तकनीकी (यीनी जो न तो बिल्कुल मानव श्रम पर आधारित हो और न अति आधुनिक तकनीकी पर) के आधार पर पूरे समाज के गठन की बात की।

विचारों के स्तर पर बदलाव के साथ-साथ वर्तमान औद्योगिक समाज में निहित निर्मम प्रतिस्पर्धा के खिलाफ पश्चिमी दुनिया में भी समय-समय पर भावनात्मक विद्रोह होते रहै हैं। साठ और सत्तर के दशक में वर्तमान समाज के स्थापित मूल्यों के खिलाफ हिप्पी का आंदोलन और छात्र आंदोलन हुए। इसी तरह अंधाधुंध विकास के विरोध के प्रतीक रूप में पुराने मुहल्लो (नेबरहुड) के जीर्णोद्धार के लिए आन्दोलन चलाये गये। इन आंदोलनों में पुराने मुहल्लो को नष्ट कर आधुनिकीकरण के नाम पर निर्माण उद्योग को बढ़ावा दिये जाने का विरोध किया गया। इसी तरह पर्यावरण को केंद्र में रखनेवाला ग्रीन (हरित) आंदोलन जर्मनी तथा यूरोप के अन्य देशों में राजनैतिक दल का रूप ले चुका है।

नये मूल्यों की रोशनी में संपन्नता के अनेक मानक (जैसे राष्ट्राय आय) हास्यास्पद दिखाई देने लगे हैं। सिगरेट, तंबाकू तथा शराब आदि का उत्पादन भी आज राष्ट्रीय आय में जोड़ा जाता है जबकि असल में ये समाज के लिए नुकसानदेह और ऋणात्मक हैं। इनसे पैदा होने वाले कैंसर या अन्य बीमारियां किसी भी कसौटी पर लोगों की संपन्नता या सुख बढ़ानेवाली नहीं कही जा सकतीं। वैसे ही कोई भी आदमी, जिसकी आंखों पर आधुनिक व्यापारी समाज का चश्मा नहीं चढा है, प्रदूषण पैदा कर मानव जीवन को खतरे में डालने वाले औद्यगिक उत्पादनों को राष्ट्रीय आय में शुद्ध जोड़ नहीं मानेगा। इसी तरह नरसंहार के लिए बनाये जाने वाले विभिन्न अस्त्र-शस्त्र, जिनका उत्पादन भी राष्ट्रीय आय में गिना जाता है, असल में पूरी तरह ऋणात्मक है।

इससे भी बढ़कर आधुनिक औद्योगिक समाज की जीवन पद्धति ऐसी हो गयी है कि आदमी के पास वस्तुओं का जखीरा लगता है और उसका सुख-चैन खतम हो जाता है तथा मानसिक तनाव और स्वभाव की विकृतियां विक्षिप्तता का रूप ग्रहण कर लेती हैं। बड़ी संख्या में आत्महत्या, नशाखोरी और मानसिक चिकित्स की जरूरत जीवन का अनिवार्य अंग बन जाती है।

जैसे-जैसे आधुनिक सभ्यता के ये पक्ष लोगों की निगाह के सामने आने लगे हैं, वस्तुओं को केंद्र में रखने वाले मूल्यों की जगह मनुष्य को केंद्र में रखने वाले मूल्यों पर आधारित नयी सभ्यता की जरूरत महसूस होने लगी है। लेकिन नये मूल्यों का एहसास ही समाज को नयी दिशा देने के लिए काफी नहीं। इसके लिए ठोस शुरुआत कैसे हो सकती है इस पर भी विचार करना जरूरी है।

चूंकि केंद्रीय नियोजन से अनेक स्थापित स्वार्थ जुड़े हुए हैं, सबसे पहले केंद्रित नियोजन को खतम कर नियोजन को विकेंद्रित कर देना जरूरी होगा। इससे नियोजन का आधार वर्तमान बड़े उद्योगों और संपन्न वर्गो की आवश्यकता के अनुसार कुछ भौतिकी लक्ष्यों की प्राप्ति के बजाय आम लोगों की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति के लिए उत्पादन करना हो सकेगा। इसके हिसाब से सत्ता के विकेंद्रीकरण को प्राथमिकता देनी होगी। वर्तमान नियोजन में चाहे वह केंद्रीय सरकार की हो अथवा निजी क्षेत्र के विशाल प्रतिष्ठानों द्वारा नियोजन, इन दोनो ही में थोक उत्पादन के ही लक्ष्य निर्धारित होते हैं जैसे कुछ करोड़ टन इस्पात, कुछ करोड़ टन पेट्रोलियम, कुछ करोड़ टन कोयला, कुछ हजार अदद मोटरगाड़ियां,कुछ करोड़ मेगावाट बिजली की क्षमता आदि। इन लक्ष्यों के निर्धारण के पीछे बड़े औद्योगिक या अन्य प्रतिष्ठानों द्वारा प्रस्तुत मांग होती है या कपड़ा जैसी उपभोग की वस्तुओं के मामले में वर्तमान खपत के आधार पर अनुमानित अग्रिम उत्पादन के लक्ष्य। लेकिन वर्त्तमान खपत बाजार की मांग या क्रय शक्ति और इसकी सीमा के भीतर लोगों की पसंद को प्रतिबिम्बित्त करती है, लोगों की वास्तविक आवश्यकता को नहीं। सोवियत संध में भी काफी ऐसी वस्तुओं का उत्पादन होता रहता जिनके लिए उपभोक्ता नहीं थे, जब कि लोगों को आवश्यत वस्तुओं का अभाव रहता था। दूसरी ओर गैर जरूरी वस्तुओं के उत्पादन का लक्ष्य बना लिया जाता है और फिर संपन्न लोगों में विज्ञापन द्वारा उनके लिए बाजार पैदा क्रिय जाता है। इसके विपरीत अगर नियोजन नीचे से हो यानी पंचायतों या प्रखण्डो के रत्तर पर हो तो नियोजन का आधार लोगों की जरूरतें होंगी।

गांव के लोगों की बुनियादी आवश्यकताएं अभी तक इतनी उपेक्षित रही हैं कि उनकी पूर्ति के लिए गांवों में सब प्रकार के श्रम और कौशल को क्रियाशील करने की जरूरत होगी। इससे बेराजगारी स्वत: मिटेगी और रोजगार के बढ़ने से लोगों की क्रय शक्ति और आवश्यक वस्तुओं का बाजार भी फैलेगा। नीचे से नियोजन में काफी हद तक पारंपरिक कौशल, जो ऊपरी नियोजन से खत्म हो रहे हैं नयी आवश्यकताओं के अनुरूप बनाये जा सकंगे और इसके आधार पर गांव का निर्माण संभव होगा। काफी हद तक गांवो में सड़क, अस्पताल, स्कूल, पुस्तकालय भवन और लोगों के आवास निर्माण का काम स्थानीय श्रम, कौशल और संसाधनों के आधार पर हो सकताहै। इनके लिए बड़े इस्यात कारखानों या सीमेंट कारखानों द्वारा निर्मित वस्तुओं की जरूरत नगण्य होगी, आवास के लिए जलवायु के उपयुक्त और स्थानीय रूप से उरलब्ध साधनों के आधार पर लगभह सभी जगह जरूरत के हिसाब से भवन निर्माण का कौशल परम्परागत रूप से उपलब्ध है। इस प्रकार के निर्माण में अक्सर स्थापत्य का ज्ञान रहता है और साथ ही कलात्मकता भी अद्भुत होती है।

खर, बांस, लकड़ी, ताड़ और नारियल की लकड़ी या पत्ते से निर्मित घरों की एक विशेषता यह है कि इन्हें बनाने में, उपयोग में, आने वाली वस्तुएं घरों का जीवनकाल खतम होने पर हवा, जल और कीटाणुओं की क्रिया से पुन मिट्टी में बदल जाती हैं और खाद बनकर उत्पादन चक्र में शामिल हो जाती है, इनका स्थान लेने के लिए नयी लकड़िया, खर, बांस आदि फिर तैयार हो जाते हैं। इनके विपरीत ईंट, खपरैल आदि बनाने में मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत हमेशा के लिए खेती के लिए बेकार हो जाती है। हजारों साल तक इन्हें फिर वापस मिट्टी में नहीं मिलाया जा सकता। इसलिए ईंट, खपरैल आदि के आधार पर गावों में रहने वाले करोड़ों लोगों को आवास नहीं दिया जा सकता। इसी तरह सीमेंट तैयार करने में लगातार चूना पत्थर की खुदाई में उनके भण्डार का हास हो रहा है और इसमें ऊर्जा की भारी खपत होती है। पारम्परिक आवास लगभग पूरी तरह स्थानीय रूप से उपलब्ध उद्भिज पदार्थों में प्राप्त वस्तुओं से तैयार होते हैं और उनके निर्माण से पर्यावरण संतुलन नहीं बिगड़ता। इन्हें आग आदि से बचाया जाय ऐसी समस्याएं जरूर नये विज्ञान के लिए चुनौती रहेगी।

विकेंद्रित ढांचे में ग्रामीण अर्थव्यवस्था यथासंभव आत्मनिर्भर होगी और जहां तक हो सकेगा, स्थानीय संसाधनो के आधार पर लोगों की जरूरत के हिसाब से वस्तुओं के निर्माण की योजना बनायी जायेगी। इसमें कृषि तथा विभिन्न वस्तुओं का निर्माण करने वाले स्थानीय उद्योग एक-दूसरे की आवश्यकताओं की पूर्ति करेंगे। विनिमय इस अर्थव्यवस्था में भी होगा, लेकिन विनिमय का स्वरुप अंतर्राष्ट्रीय न होकर, जैसाकि वह आज है, स्थानीय होगा, जिनमें विनिमय का दायरा कुछ ऐसी वस्तुओं को छोड़कर, जो स्थानीय रूप के उपलब्ध नहीं है, प्रखण्ड या प्रमंडल के स्तर पर होगा। ऐसे क्षेत्रों में कृषि, उद्योग और स्वयं विभिन्न उद्योग भी एक-दूसऐ के पूरक होंगे और शेष के भीतर के संसाधनो श्रम और कौशल का पूरा-पूरा उपयोग करेंगे। इसमें एक उद्योग की आवश्यकताएं अन्य उद्योगों के लिए बाजार उपलब्ध करायेंगी—जैसे कपड़ा उद्योग कपास, रंग, साबुन, कताई तथा बुनाई की मशीनों का बाजार बनायेंगे।

अभी भारत में जीवन की आवश्यक वस्तुओं का ऐसा घोर अभाव है कि लोगों की जरूरतों की पूर्ति के लिए नीचे से नियोजन करने में सभी लोगों के श्रम और कौशल का पूरा उपयोग करना जरूरी हो जायेगा। अदक्ष और दक्ष श्रमिक दोनों ही निर्माण कार्य और उद्योगों में लगेंगे। लोगों को शिक्षित करने में गांव के शिक्षित लोगों को काम मिलेगा। इंजीनियरों को निर्माण और उद्योगों में काम मिलेगा, डॉक्टरों को लोगों के स्वास्थ्य की देखभाल में मूरा समय देना होगा । यह जरूर है कि डॉक्टरों और इंजीनियरों का प्रशिक्षण समाज की आवश्यकता के अनुसार से ढालना होगा और उसमें व्यवसाय-बुद्धि के बजाय सही वैज्ञानिक दृष्टि और ज्ञान पर बल दिया जायेगा, ताकि तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता के अनुरूप ढालने लायक सोच हो सके, न कि भारतीय डॉक्टरों और इंजीनियरों की वर्तमान स्थिति बनी रहे, जहां वे बाहर से आयातित ज्ञान को बिना देश या बीमार व्यक्ति की जरूरत को समझे कठमुल्लों की तरह इस्तेमाल किया करते हैं।

ऐसे गांवों और छोटे शहरों के लिए ऊर्जा की जरूरत मूलत: छोटी पनचक्कियों, छोटी पनबिजली योजनाओं, वायु-प्रवाह, सौर ऊर्जा उद्भिज व गोबर गैस और कुछ कामों के लिए बैल, घोड़े आदि से पूरी होगी। ऊर्जा के ये सभी स्रोत ऐसे हैं, जो करोड़ो वर्ष तक उपलब्ध होते रहेंगे। यहां एक बात की ओर ध्यान दिलाना जरूरी है। हम सब इस वैकल्पिक विकास की बात करते हैं तो हम यह भी मानकर चलते हैं कि ऐसा समाज होगा जिसमें केंद्रीय स्थान होगा ग्रामीण व्यवस्थाओं का और कुछ विशेष आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बिखरे हुए छोटे-छोटे शहर होंगे, जो शिक्षा का केंद्र, छोटे परिमाण में आवश्यक विनिमय केंद्र और ऐसे उद्योगों के स्थान होंगे, जिन्हें गांवों के स्तर पर नहीं लगाया जा सकता।

वर्तमान में ऊर्जा का बहुत अधिक खर्च विशेषकर तेज परिवहन पर होता है ओर वह इसलिए कि अर्थव्यवस्था का आधार वृहत् उद्योग और अंतर्राष्ट्रीय विनिमय है। वृहत् उद्योगों के इर्द-गिर्द स्वत: बड़े नगर बस जाते हैं और फिर इन नगरों के लोगों की जरूरत की पूर्ति के लिए अन्य उद्योग और इनमें काम करने वाले लोगों की भीड़ बढ़ती जाती है। इस तरह नगरों का लगातार विस्तार होता जाता है। लिहाजा नगर इतने विशाल हो जाते हैं कि उनमें काम पर पहुंचने या अन्य जरूरतों की मूर्ति के लिए लोगों को लम्बी दूरी तय करनी होती है। इस कारण नगरों की यह मजबूरी होती है कि तेज वाहनों की व्यवस्था करें। तेज वाहनों पर भारी मात्रा में ऊर्जा खर्च होती है और वह ऐसी होती है कि उसे केंद्रीत ऊर्जा उत्पादन या वितरण के जरिये ही प्राप्त किया जा सकता है। इसी तरह अंतर्राष्ट्रीय विनिमय के लिए तेज यातायात और संचार-व्यवस्था की जरूरत होती है। इससे बड़े और तेज वायुयान, पानी के विशाल जहाज, भारी मोटरगाड़ियों आदि के लिए ऊर्जा का इन्तजाम करना होता है। अंतर्राष्ट्रीय विनिमय में औद्योगिक प्रतिस्पर्धा की खास भूमिका होती है। इससे अक्सर अमेरिका में तैयार मोटरगाड़ियां,कंप्यूटर तथा अन्य वस्तुएं भारी मात्रा में जापान और जर्मनी भेजी जाती हैं और जापान और जर्मनी में निर्मित ये ही वस्तुएं अमेरिका भेजी जाती है। इसके विपरीत स्थानीय उद्योगों की जरूरत की पूर्ति करने वाले उद्योगों के लिए ऐसे निरर्थक निर्यात और आयात पर कोई ऊर्जा खपत नहीं करनी होगी। इसी तरह गांवों या छोटे शहरों में रहने वाले लोगों को काम पर जाने या अन्य जरूरतों की पूर्ति के लिए परिवहन पर कोई खर्च नहीं करना होगा।

केंद्रीय रूप से उत्पादित और वितरित ऊर्जा के संबंध में कुछ तथ्य विचारणीय हैं। एक ऊर्जा विशेषज्ञ ऐमौरी लोविंस के अनुसार इंग्लैंड में किये गये एक अध्ययन से यह नतीजा निकला था कि उपभोक्ता द्वारा ऊर्जा पर खर्च किये गये 100 सेंट में सिर्फ 29 सेंट ही ऊर्जा की कीमत थी और वाकी 71 सेंट तो ऊर्जा के वितरण के खर्च के लिए उसे चुकाने पड़े। इससे यह नतीजा निकलता है कि ऐसी ग्रामीण व्यवस्था में, जिसमें ऊर्जा के स्थानीय स्रोत ही होंगे, उपभोक्ताओं को एक तिहाई खर्च से उतनी ही ऊर्जा उपलब्ध हो सकती है, जितनी उन जगहों में, जहां ऊर्जा का उत्पादन और वितरण केन्द्रित है। इंग्लैंड में कुल ऊर्जा का 26 प्रतिशत परिवहन पर, 66 प्रतिशत घर आदि के गरम रखने में और सिर्फ 8 प्रतिशत ही बिजली के रूप में ऐसे कामों पर खर्च किया जाता है, जिनके लिए बिजली का उपयोग अनिवार्य है।[4] यही नहीं ऊर्जा का जो 66 प्रतिशत ताप पहुंचाने में काम आता है, उसे भी 55 प्रतिशत पानी के उबाल से कम तापमान का ताप पहुंचाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसका अर्थ यह है कि 55 प्रतिशत ऊर्जा सूरज की किरणों से बहुत कम खर्च पर सीधे उपयोग के लिए प्राप्त की जा सकती है,अगर ताप पहुंचाने की केन्द्रित व्यवस्था की जगह ऊर्जा का उपयोग वहीं हो, जहां उसे सूरज से लिया जाए। सौर ऊर्जा के लिए कीमती संयंत्रों की जरूरत तभी पड़ती है, जब उसे बिजली में बदला जाय। चूंकि ऐसे कामों के लिए ऊर्जा की खपत की आवश्यकता बहुत कम होती है, ऐसे संयंत्रों पर खर्च करना मुश्किल नहीं होगा और दीर्घकालीन परिपेक्ष्य में यह भी सस्ता पड़ेगा क्योंकि एक बार ऐसे संयंत्र लगा देने के बाद ईंधन पर कोई खर्च नहीं आयेगा और जो भी खर्च आयेगा,यह सिर्फ संयंत्रों के रखरखाव और उनकी मरम्मत पर ही आयेगा।

चूंकि विकेंद्रित अर्थव्यवस्था में परिवहन पर खर्च बहुत ही कम हो जायेगा,इसके लिए अनावश्यक ऊर्जा सौर बैटरी (बैटरी पर चलनेवाली वाहनो के लिए) से या जमीन से पैदा होने वाले खर, घास-पात, भूसे की गैस या गन्ने से प्राप्त अल्कोहल से उपलब्ध हो सकेगी। भारत ऐसे देश में खासकर स्थानीय परिवहन और ढुलाई के लिए बैल, घोड़े, ऊंट, खच्चर आदि का प्रयोग होता रहेगा क्योंकि आज भी अधिकांश गांवों में और कुछ हद तक नगरों में भी माल ढोने का ज्यादा काम इनसे ही लिया जाता है। इनकी उपयोगिता तभी खतम होती है, जब परिवहन की दूरी बहुत बढ़ जाती है और तेज रफ्तार आवश्यक हो जाती है। चूंकि ये पशु प्रकृति के जीवन चक्र के स्वाभाविक अंग होते हैं, वे कम से कम खर्च यानी चारे, भूसे से ये ज्यादा से ज्यादा ऊर्जा देते हैं। इनका मलमूत्र, खाद और गैस का स्रोत है और चमड़ा औद्योगिक वस्तुओं के लिए उपयोगी। गोबर गैस के घर-घर प्रसार से न सिर्फ खाना पकाने के लिए ईधन और रोशनी की सस्ती व्यवस्था हो सकेगी बल्कि खेतों के लिए उम्दा किस्म की सस्ती खाद की भी उपलब्धि भारी मात्रा में हो सकेगी, जो आज ईंधन के लिए गोबर और घास-पात जला देने से नष्ट हो जाती है। खेती के लिए उर्वरकों की खपत घटायी जायेगी और जैविक (आरॅगैनिक) खाद उसका स्थान लेगी, जिसकं लिए उत्पत्ति-विज्ञान (जेनेटिक्स) की नयी उपलब्धियों का पूरा योगदान लिया जा सकेगा।

जैसाकि पहले कहा गया है, इस तरह की व्यवस्था समतामूलक समाज में ही संभव है। जहां लोगों की आय में घोर गैरबराबरी हो, वहां इस तरह की व्यवस्था नहीं चल सकती। अगर देश में ऐसे प्रतिष्ठान बने रहें, जहा थोड़े से लोगों की आय सामान्य लोगों की आय से बहुत अधिक है या बड़ी जोतों में दूसरों के श्रम के शोषण के आधार पर कुछ लोगों की आमदनी बहुत अधिक है, तो यह व्यवस्था नहीं चल पायेगी। यह संभव नहीं होगा कि इंजीनियरों, डाक्टरों या अन्य कौशल वाले लोगों को गांवों में काम करने के लिए उनकी जरूरत की पूर्ति भर का वेतन दिया जाय जबकि अन्य जगह ऐसी ही योग्यता वाले लोगों की आमदनी कई गुना अधिक हो। गैरबराबरी की अर्थव्यवस्था में निहित प्रतिस्पर्धा के कारण दुनिया के संसाधनो की रक्षा नहीं हो सकती और ना ही इसमें बुनियादी जरूरतों पर आधारित नीचे से नियोजन की सफलता संभव है। इसलिए गैरबराबरी के खिलाफ जेहाद नयी विकास नीति का आवश्यक अंग होगा।

            इस सारी प्रक्रिया की शुरूआत राजनीतिक सत्ता को विकेंद्रित करने के संकल्प से ही शुरू हो सकती है क्योंकि केंद्रित राजनीतिक सत्ता पर अनिवार्य रूप से संपन्न वर्गो और बड़े प्रतिष्ठानों को चलाने वाले लोगों का प्रभाव रहता है। इस कारण केंद्रीय नियोजन का इन्हीं वर्गो और प्रतिष्ठानों की आवश्यकता को ध्यान में रखकर होना अनिवार्य हो जाता है। केंद्रीय सत्ता के ऐसे विकेंद्रीकरण से जिसमें सर्वाधिक अधिकार समाज के निचले स्तरों को हों, नियोजन की निर्णायक शक्ति आम लोगों के पास आ जायेगी, जिससे वे अपनी रुचि और जरूरत के अनुसार आर्थिक नियोजन और निर्माण कर सकेंगे।

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[1]अंततः अपनी नीति के कारण सोवियत यूनियन ध्यस्त हो गया और चीन विश्व पूंजीवादी व्यवस्था का अंग बन गया।

[2] ये आंकड़े घटते-बढ़ते रहते हैं, लेकिन व्यवस्था के स्वभाव में निहित होने के कारण मिटते नहीं।

[3] कृषि के मशीनीकरण के कारण मवेशियों के रख-रखाव एवं हल, बैलगाड़ी आदि चलाने वाले लोगों का बेरोजगार होना भी गांव छोड़ने की मजबूरी के पीछे है।

[4] ये आकड़े कुछ पुराने हैं, लेकिन कमोबेश पैटर्न यहीँ बना रहता है।

 

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