गाॅधी की दीक्षा

– राधा भट्ट

भाई चन्दनपाल अगस्त 2012 से कोकराझार में चल रहे ‘‘शान्तियात्रा’’ अभियान की एक जोड़ने वाली कड़ी रहे हैं। बी.टी.ए.डी. में शान्ति कार्य से पूरे देश को  जोड़ने के काम को उन्होंने अपना सम्पूर्ण तन-मन, सोच -समझ, दिल-दिमाग और भावना-प्रतिभावना दी है। जिस प्रकार उन्होंने यह जुड़ाव खड़ा किया उतने ही मनोयोग की परवाह किये बिना उन्होंने बी.टी.ए.डी. के विभिन्न समुदायों को एक दूसरे से जोड़ने में भी स्वयं को एक कड़ी बनाया है।

2 मई 2014 को सर्वसेवा संघ की कार्य समिति हैदराबाद में चल रही थी। खबर आई कि बी.टी.ए.डी. में तीन मुस्लिम गाॅवों के 37 लोगों को मार दिया गया है। इस खबर से चन्दनभाई केवल दुखी ही नहीं हुए, बी.टी.ए.डी. में पहुॅचने और हालात को शान्त करने में कुछ भी करने के लिए छटपटाने लगे। ‘‘इस हिंसा की प्रतिक्रिया में यदि मुस्लिम समुदाय उठ खड़ा हुआ तो भयंकर स्थिति हो जायेगी, हिंसा प्रतिहिंसा के उस सिलसिले को, उस कुचक्र को रोकना मुश्किल हो जायेगा।’’ यह उनकी चिन्ता थी। उनके लिए बी.टी.ए.डी.से लगातार फोन पर समाचार आ रहे थे कितने पुरूष, स्त्री और बच्चे यहाॅ तक कि 5 वर्ष के बच्चे और गर्भवती मातायें गोली की शिकार हो गयी थीं। गाॅव के  पास बह रही बिना पुल की नदी को तैरकर भागते हुए कितने ही लोग नदी के प्रवाह में बह गये थे, रात के अंधेरे में सोते हुए परिवारजनों को गोली मार कर चिरनिद्रा में सुला दिया गया था। एकदम भयंकर अकल्पनीय क्रूरता अमानवीयता की पराकाष्ठा दूर हैदराबाद में केवल सुनकर भी हमारे दिल दहल रहे थे।

तभी चन्दनभाई के फोन पर एक युवक की आवाज गूॅजी। यह कोकराझार जिले केे गुंसाईगाॅव गाॅव नामक का बी. काम. का छात्र सइदुल था। ‘‘सर मैंने तय किया है कि हम हथियार नहीं उठायेंगे क्योंकि हमने गाॅधी की दीक्षा ली है। हम उनके आश्रम में गये हैं, हमने उनका जन्म स्थान देखा है और हम उनकी युनिवर्सिटी में चार दिन रहे हैं। मैं अपने समूह के सभी साथियों को कह रहा हूँ- हमें अपने हाथों में बन्दूक नहीं उठानी है।’’ यह सुनकर हम गदग्द हो गये।

सइदुल भाई उस समूह के युवक-युवतियों के बीच के एक युवा थे, जो बी.टी.ए. डी. से कलकत्ता, जलगाॅव, बारडोली, दाॅडी, साबरमती, गुजरात विद्यापीठ, पोरबन्दर और दिल्ली में गाॅधी के विचार की कुछ समझ लेने के लिए बाहर निकला था। इस समूह में बाक्सा, चिरांग, कोकराझार और धुबड़ी जिलों के बोडो, मुस्लिम, राजवंशी, राभा और संथाल सभी समुदायों के युवक और युवतियाॅ थीं। यह यात्रा इन 37 युवाओं में से कई के लिए जीवन को मोड़ देने वाली साबित हो रही थी, यह हमें बी.टी.ए.डी. में उभरी अभी की हिंसा की इस कू्ररता के बीच दिखायी दिया था।

यों 15 दिनों की यह सद्भावना यात्रा इस समूह के लिए मात्र देश-दर्शन की सैलानी यात्रा नहीं थी। इसके लिए ‘शांति-यात्रा’ ने पाॅच दिन का शांति सद्भावना युवा शिविर आयोजित किया था। जिसमें इन्होंने सभी समुदायों के हमउम्र युवाओं के साथ खाते-गाते, खेलते, श्रम करते व विभिन्न विचारकों व कार्यकर्ताओं के विचार सुनते, उनसे संवाद-विमर्श करते हुए अपने मन-मस्तिष्क को खोला था, प्राजंल बनाया था। ट्रेन की लंबी यात्राओं में इनके मागदर्शक समर्पित व अनुभवी वरिश्ठ कार्यकर्ता श्री चन्दनपाल, श्रीह धर्मेन्द्र भाई व श्री नटसूर्य भाई से भी इनको लगातार विमर्ष करते हुए बहुत कुछ सीखने को मिला था।

सत्याग्रह के इतिहास का विष्व प्रसि़द्ध स्थल दाॅडी में इन युवाओं के ह्नदय भावभिभूत हो गये थे कि ये ही स्थान है, जहाॅ से गाॅधीजी ने ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें हिला दी थीं।

गुजरात विद्यापीठ में इन्हें विद्यापीठ के छात्रालयों में प्रत्येक छात्र को एक छात्र तथा छात्रा को एक छात्रा के साथ 4 दिन रहने का अवसर दिया गया था। ये उन छात्र-छात्राओं के अतिथि थे और दिन भर हर कार्यक्रम में साथ रहते थे। सुदूर भूटान सीमा पर रहने वाले इन युवाअेां ने इन चार दिनों में गुजरात का स्नेह निकट से पाया और गुजरात के युवाओं के मैत्री के तार दूर बी.टी.ए.डी. की भूमि से जुड़ गये।

8 मई 2014 को इस समूह के चार युवाओं ने राज्यपाल आसाम से भेंट की थी, तो उन्हें उत्साह से बताया था, ‘‘हमारे देश में ऐसी युनिवर्सिटी है, यह हमें पहले पता नही था, जहाॅ छात्र इतने प्रेम से सामूहिक श्रम कार्य करते हैं, बडी़ व छोटी कक्षाओं के छात्रों के बीच भेद की तो बात ही नहीं, आपसी भाईचारा व प्रेम है। वे छात्र विशाल सभागार में जब खादी वस्त्र पहने चर्खों पर कताई करते हैं तो सारा सभागार गूॅज उठता है और एक अद्भुद वातावरण बना देता है।’’

शायद सईदुल भाई इसी को गाॅधी की दीक्षा लेना कहते हैं। इस अनुभव का असर उनके दिल दिमाग पर इतना है कि इसी ने उन्हें सक्रिय कर दिया था मई की प्रथम तारीखों में घटी हिंसा का प्रत्युतर अपने उदार प्रेम भाव से देने के लिए। सईदुल भाई की तरह पलासगुड़ी का निवासी छात्र है रव्युलआलम। 9 मई को हमें गाॅवबूढ़ा भवन कोकराझार में पहॅुचे कुछ घंटे ही हुए थे कि रव्युलआलम भाई का फोन आ गया है, ‘‘हमने कल एक शांति सभा आयोजित की है। जिसमें मुस्लिम बोड़ो राभा राजवंशी सभी आयेंगे, इसमें सुबह 10 बजे आ जाइए।’’

दूसरे दिन सभा के पूर्व हम परिवारों की भेंट के लिए गाॅव में निकले-सद्भावना यात्रा समूह की अमीना बेगम (कालेज की छा़त्रा) जिसने रव्यूलआलम भाई के साथ मिलकर शांति सभा का आयोजन पलासगुड़ी गाॅव में किया था, हमें एक बोड़ो परिवार में ले गयी और हमारे बैठने के लिए उनके घर से कुर्सी उठा कर ले आयी। बोड़ो घर में घुसकर पानी का जग व गिलास ले आई, ऐसा लगा मानो यह बोड़ो घर उसका ही घर न हो, गृहस्वामिनी को मदद करने लगी। कुछ ही देर में पड़ोसी बोड़ो पुरूष आकर बैठे और हमें अपूर्व आनन्द हुआ कि प्रोफेसर शमसुलहक अपने कुछ मुस्लिम शिक्षकों के साथ आकर इस मंडल में बैठ गये। सहज गपशप होने लगी। हिंसा की दहशत भरी सनसनी के बीच यह मित्र मंडल मानो हिंसा को अंगूठा दिखा रहा हो और यह अमीना बेगम परिवार की बिटिया की तरह सभी को पानी दे रही है, सुपारी पेश करके स्वागत कर रही है। जबकि गृहस्वामी हमारे साथ बातों में मशगूल है। यह कैसा दृश्य ?

हम हर रोज ही विविभन्न गाॅवों में डर हटाने व विश्वास बढ़ाने के लिए शांति सद्भावना सभाओं को सम्बोधित कर रहे थे जो इन्हीं युवाओं रव्युलआलम, सईदुल, अमीनाबेगम, रंजीताबेगम, रंजन बोडो, संजय शाहू ने इनके गाॅवों के अन्य युवाओं और वयस्कों को साथ  लेकर आयोजित की थीं।

एक दिन अमीना हमें सभास्थल से कुछ दूर अपने मामा के घर पर ले गई, जो शिक्षक हैं।‘‘इसकी मामी को अपने छोटे बच्चे के साथ मैंने सुरक्षित स्थान पर भेज दिया है। देखिये ये हमारी पड़ोस, ये बोड़ो हैं।’’ हमने शिक्षक महोदय को बहुत समझाया डर को दिल से निकाल देने के लिए पर वे कितना समझे, वे ही जाने। खैर -।

उस दिन बाद में मैंने अमीना बेगम से पूछा, ‘‘अमीना तुम्हें बोड़ो गाॅव में जाने में डर नहीं लगता? तुम उनके परिवार में सहज ही चली जाती हो। कुछ खतरा तो नहीं महसूस करती?’’ ‘‘नहीं दीदी, हम तो अहिंसा वाले हैं, हमें किस बात का डर और किस बात का खतरा?’’ मेरी नम होती आॅखों में भविष्य के एक समरस समाज का दृश्य उभर आया जिसकी बागडोर अमीना बेगम रव्युल आलम रंजन बोड़ो और सईदुल भाई जैसों के हाथों में होगी।

इन सभाओं को  स्थानीय शिक्षक सम्बोधित करते, गाॅव के गाॅवबूढ़ा व अन्य नागरिक तथा पड़ोसी गाॅवों से आये नागरिक व गाॅवबूढ़ा भी सभा में बोलते, बोड़ो मुस्लिम, राभा, राजवंशी सभी बोलते थे। अन्त में पूरे दिल को उड़लते हुए बोलते थे प्रो0 शमशुल हक, ‘‘शांति सद्भावना केवल शब्द नहीं हैं बोलने के लिए, ये तो करने का कर्तव्य है। हमारा धर्म है जीवन का। ‘‘वे हमसे भी अधिक प्रभावपूर्ण बोलते क्योंकि वे वहाॅ की स्थानीय घटनायें कहते थे और क्योंकि वे इस शांति अभियान के लिए अपना समय व समझ लगाते थे।

युवाओं के हौसले बढ़ते जाते थे। उनके हौसलों को और भी बल देने के लिए उनके अपने काॅलेज के प्रिन्सिपल उन सभाओं में शिरकत ही नहीं करते थे, सभा विसर्जन के बाद युवाओं के हाथों में कुछ रूपये रखते हुए कहते थे, ‘‘तुम इतनी कुर्सियाॅ, मेजें और शामियाने लाये हो। यह काम करते जाओ हम मदद करेंगे।’’

आज शांति की अभिलाषा सबके दिलों में हैं अहिंसा की शक्ति भी भीतर छिपी है किन्तु वह हिंसा के पूजकों की मनोवृत्तियों को बदल देने की पूरी क्षमता प्रकट नहीं कर पायी है। उसके लिए जीवन के जन्म से अन्त तक के हर क्रिया कलाप में उस अहिंसा को गूंथना होगा। समाज के हर तबके, सरकारों, शिक्षाविदों, राजनीतिज्ञों और बुद्धि-जीवियों को भी इसमें पिरोना होगा।  यह लम्बा और कठिन काम है पर करने से क्या नहीं हो सकता? कम से कम ‘‘हम अहिंसा वाले’’ व ‘‘गाॅधी की दीक्षा’’ कहने वाली इस नयी पीढ़ी को उस दिशा में बढ़ने का हौसला देना क्या वाजिब नहीं होगा? क्या इस काम को छोटा मान कर छोड़ देना चाहिए या इसे अपनी मेहनत-पसीना देकर, प्राण खतरे में डालकर भी आगे बढ़ाना चाहिए?

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