वर्तमान समस्याओं के सन्दर्भ में हिन्द स्वराज की प्रासंगिकता

 – प्रो. समदोंग रिनपोचे

आज का व्याख्यान सिद्धराज ढड्ढा की स्मृति में आयोजित किया गया है। मैं अपने हृदय से उनके प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता की भावना प्रकट करना चाहता हूँ। उनका जीवन एक आर्दश जीवन रहा है। विशेष रूप से गांधी-विचार को इस देश में जीवित रखने के कार्यों में, संकट की घड़ियों में जयप्रकाशजी के साथ रहकर भी जो कुछ उन्होंने कार्य किया, सर्व सेवा संघ जैसी अनेक संस्थाओं का संचालन कर मार्गदर्शन किया वह केवल सुमिरन करने की बात भर नहीं है अपितु एक दिशा एंव मार्ग प्रशस्त करनेवाला है। हम उसका सुमिरन करेंगे और अनुसरण करने का प्रयास तभी उनके प्रति श्रद्धांजलि दे पायेंगे, ऐसा मेरा विचार है।

आज की बातचित करने का विषय है ‘हिन्द स्वराज’ के आधार पर समाज की विकृत-व्यवस्था को कैसे सुधारा जाये। आजकल दो बातों पर बल दिया जाता है। एक तो प्रासंगिकता और दूसरा विकल्प। बार-बार पूछा जाता है कि गांधी का विचार आज प्रासंगिक है कि नहीं और दूसरा यह कि इसका विकल्प क्या है? जब गांधी के विचारों के अनुरूप जीवन को संचालित नहीं करना हो तो यह प्रश्न प्रासंगिक नहीं रहता है, अपितु एकेडेमिक हो जाता है। एकेडेमिक प्रश्न भी अपनी जगह पर महत्व के हैं। बहुत लोग एकेडेमिक कार्य को ही महत्व देते हैं। पाश्चात्य देशों में ऐसा माना जाता है कि यदि कोई व्यक्ति किसी विचार में विश्वास रखते है तो वह उसको एकेडेमिक रूप में देख नहीं सकते हैं। मेरे एक मित्र बहुत प्रकाण्ड बौद्ध-दर्शन के विद्वान हैं। उनको यूनिवर्सिटी में अध्यापक का पद मिलने में बहुत कठिनाई हुई। उनका यह मानना था कि ये तो बौद्ध हो गये हैं, इसलिए बुद्धिज्म को एकेडेमिक दृष्टि से कैसे पढ़ा सकेंगे। वह अपने एक पक्ष का हो गया है तो वह एकेडेमिक नहीं रहेगा। यह पाश्चात्य सोच का दृष्टिकोण है। इस सन्दर्भ में यदि गांधी के बारे में सोचेंगे तब यह प्रश्न ठीक है।

एकेडेमिक प्रश्न है तो इसे एकेडेमिक के तौर पर सोचा जायेगा, प्रासंगिक है या नहीं या इसका कोई विकल्प है या नहीं? अगर गांधी के विचारों को हम अपने जीवन में उतारेंगे, संपादित करेंगे तब यह दोनों प्रश्नों का उत्तर है कि यह प्रासंगिक भी है और विकल्प भी। मुझे नहीं लगता है कि विकल्प या प्रासंगिक शब्द भारतीय सोच पर खड़ा है। पाश्चात्य सोच में आल्टारनेटिव सोच-पद्धति है और उससे हमारी सोच को प्रभावित किया है। अधिकांश लोग वह शब्दावली इस्तेमाल करते हैं जो पाश्चात्य पद्धति से प्रचलित है, इसलिए हमारी सोच और हमारी खोज, अगर हम बहुत ध्यान से नहीं देखेंगे तो वह किसी दूसरी दिशा में निर्देशित होती रहती है। इसलिए हमें उसको स्वीकारने में देर लगती है। एक भारतीय व्यक्ति, भारतीय पद्धति से जिये, भारतीय सोच पद्धति से सोचे तो उसमें एक मौलिकता रहती है। एक तिब्बती आदमी एक तिब्बती रूप में जिये और उसी रूप में सोचे तब वह सोच मौलिक रहती है। लेकिन हम लोगों में यह आदत डाल दी गयी है कि जो कुछ सोचना, जो कुछ खोजना, जो कुछ विश्लेषण करना है तो वह पाश्चात्य पद्धति से करें ताकि उसको कहा जा सके कि वह वैज्ञानिक है, उसे साइंटिफिक मैथडोलाजी से खोजा गया है और सोचा गया है। अपने को साइंटिफिक बताने की चिंता और उसकी चाहत बहुत लोगों के दिमाग में घुस गयी है। बहुत से हमारे मित्र श्रीलंका के, थाइलैण्ड के बहुत बड़े-बड़े विद्वान अपने भाषण में यह सिद्ध करने की चेष्टा करते रहते हैं कि बुद्धिज्म एक साइंटिफिक रिलिजन है। मैं बहुत बार कहता हूँ कि आप साइंटिफिक हो गये तो रिलिजन कहाँ रह गया। तब तो वह एक ही जगह रह गया है। साइंटिफिक और रिलिजन ये दोनों कभी एक साथ आने-वाले नहीं हैं। अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए वे अपने धर्म को भी साइंटिफिक बताने का प्रयास करते हैं, चाहे वे साइंटिफिक हों या न हों यह दूसरा प्रश्न है। साइंटिफिक कहने में कद ऊँचा होता है या कोई श्रेष्ठता मिलती है, ऐसा सोतचे हैं। इस चक्कर में बहुत लोग हैं। गांधी के अनुयायी लोगों में भी। एक बार मेरे किसी मित्र ने बहुत खुले मन से कहा कि हम गांधीजी की बात जहाँ-जहाँ करते हैं तो बाकी सब ठीक है परन्तु जहाँ साइंस और विकास की बात आती है तो हम कुछ जवाब नहीं दे पाते हैं। साइंटिफिक टेक्नोलाजी के माध्यम से विकास का होना चाहिए यहाँ विचार बाधक होता है, आप पीछे ले जा रहे हैं, आधुनिक युग से आप पीछे ले जा रहे हैं ऐसा कहा जाता है; तब हम उनको कुछ जवाब नहीं दे पाते हैं। तो मैंने पूछा कि क्यों जवाब नहीं दे पाते हैं? मात्र शरीर के लिए मनुष्य सब कुछ है? तब तो मनुष्य के शरीर के अतिरिक्त जीवन का कोई अस्तित्व है—यह सोच छोड़ना पड़ेगा। शरीर ही मनुष्य है, शरीर समाप्त हो जाते हैं तब व्यक्ति भी समाप्त हो जाता है। जो कुछ है वही जीवन है—ऐसा भारतवर्ष में भी विचार नहीं उत्पन्न हुआ है, ऐसी बात नहीं है। चार्वाक ने शरीर सुख को ही सब कुछ माना है।

परन्तु भारतीय चिंतन-पद्धति के मूल में एक समग्रता है, सम्पूर्णता है जिसमें सबको बाँधकर देखते हैं, टुकड़े करके नहीं देखते हैं। इसलिए चार पुरुषार्थ की व्यवस्था कहीं गयी। काम, अर्थ तात्कालीक जीवन के लिए हैं और दूरगामी जीवन के लिए अन्य पुरुषार्थ हैं। इस जीवन में हम चारों पुरुषार्थों को साधने का प्रयास करते हैं। इस दृष्टि में पूर्ण रूप से एक मनुष्य का जीवन जीते हैं। हम और आप मानते हैं कि यदि कोई पुरुषार्थ हम नहीं कर पाते हैं तो वह पशु के समान ही है। पशु भी अपना जीवन जीता है, जी लेता है, कोई पशु भूखा नहीं मरता है। पशु भी बच्चे परवरिश करते हैं। काम पशु भी करते हैं। इन दो बातों को प्राप्त करने के लिए मनुष्य का जीवन लेने की कोई आवश्यकता दिखाई नहीं देती। मानव का जीवन प्रज्ञावान् है, अनेक चीजों के देखने का, परखने का उसे विवेक मिला हुआ है और उस विवेक के अभिव्यक्त करने की सामर्थ्य और भाषा भी। उसके ऊपर उतरोत्तर चिंतन कर सकते हैं। तो ऐसा जीवन काम और अर्थ में बीता जाये तो वह कोई अक्लमंदी नहीं कही जायेगी। इसके बारे में खास कहने की आवश्यकता नहीं है। अगर सोचें तो अपने-आप समझ में आ जायेगा। पाश्चात्य सभ्यता ने कई अपूर्ण विचारों को उत्पन्न किया है और वे अपूर्ण विचार बहुत प्रभावशाली भी हुए हैं। कार्ल मार्क्स ने मानव के सारे सुख-दुःख को अर्थ, उत्पादन से जोड़ दिया। अर्थ के अतिरिक्त उन्होंने और कोई चीज आवश्यक नहीं समझी। उत्पादन ठीक हो जायेगा, वितरण सही हो जायेगा तो सोशलिस्ट या कम्युनिष्ट समाज बनेगा जिसमें कोई दुखी नहीं होगा। न कोई अन्याय होगा और न कोई दुःख होंगे और सारी अर्थव्यवस्था ठीक हो जायेगी ऐसा सोचा। केवल सोचा ही नहीं, कहा और ऐसा दुनिया में लागू करने लिए बहुत बड़ा अभियान चलाया जिसमें करोड़ों लोग मर-खप गये होंगे। अन्ततोगत्वा कुछ हुआ नहीं। आज कम्यूनिज्म दुनिया से विदा हो चुका है। नाममात्र शेष रह गया है। उससे मानव का दुःख नहीं मिटा। फिर सिग्मंड फ्रायड का सोच है जिसमें मनुष्य के सारे चिंतन का मूल काम, तृष्णा बताया गया : कामोक्त विचारों से हमारी सारी चित्त-वृत्तियाँ चलती हैं। फ्रायड ने यह प्रयास किया कि पुरुषार्थ में काम ही काम है और कुछ भी नहीं। दोनों जो विचार हैं वे पाश्चात्य आधुनिक सभ्यता की देन हैं। इन्होंने मनुष्य के क्या दिया और क्या नहीं दिया यह तो पिछले 150 वर्ष के इतिहास का अवलोकन करेंगे तो स्पष्ट हो जाता है। मनुष्य ने बहुत कुछ खोया है। इस प्रकार के विचारों से, पाया कुछ भी नहीं है। जो कुछ पाया भी होगा वह दैहिक सुख के लिए पाया होगा। लेकिन उस शरीर-सुख के लिए पूर्ण मानसिक शान्ति और पूर्ण सामजिक व्यवस्था का बलिदान करना पड़ा है, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है।

आज हम लोग समस्याओं की बात बहुत करते हैं। यह क्या हो गया है, वह क्या हो गया है, समाज का हर तबका असन्तुष्ट मालूम पड़ता है। यह असन्तुष्टि एवं समस्या जो हमारे सामने हैं, इस दुनिया में इसका मूल कारण क्या है, इस पर हम ध्यान नहीं देते हैं। मूल कारण पर ध्यन देना शायद आज की सभ्यता की पद्धति नहीं है – वह मूल कारण पर ध्यान नहीं देती, उस पर से ध्यान हटा देती है। अगर आधुनिक चिकित्सा की प्रक्रिया को देखें तो सारे के सारे आंशिक ट्रीटमेंट ही वे करते हैं। बुखार है तो बुखार को दबा दिया, सिर-दर्द है तो सिर-दर्द को दबा दिया; वह किसी कारण हो रहा है, उस कारण को मिटाना चाहिए, ऐसा करते नहीं हैं। इसलिए कारण रह जाते हैं। इस डॉक्टर से उस डॉक्टर के पास, इस हॉस्पिटल से उस हॉस्पिटल का पास जाते कहते हैं। एक रोग हट जाता है तो दूसरा रोग आ जाते हैं, हम उसी में घुमते रहते हैं क्योंकि मूल कराण में हम जाते नहीं। भारतीय पद्धति में किसी समस्या का समाधान खोजने में समस्या का मूल कारण क्या है—इस पर विचारना अनिवार्य माना जाता है।

तथागत बुद्ध ने चार आर्य सत्य के रूप में अपने सारे जीवनभर के विचारों को समाहित किया है। दुःख, दुःख-समुदय, दुःख-निवृत्ति, दुःख-निवृत्ति मार्ग। यह समस्या को देखने की भारतीय पद्धति है। मानव समाज में कोई-न-कोई दुःख है, दुःख तो काफी स्पष्ट होता है। उसको कोई खोजने या समझने की आवश्यकता नहीं है—सभी दुःख से पीड़ित हैं। अगर कोई दूसरा दुःख नहीं भी हो तो जन्म-मरण-वृद्धावस्था-रोग तो है ही। दुःख तो हर किसी को आता है। ये दुःख तो सब लोगों के सामने साक्षत् हैं। अगर हम दुःख नहीं चाहते हैं, दुःख से निवृत्ति चाहते हैं तो कारण खोजिए। ये सारे दुःख कहाँ से आते हैं? कारण समझ में आते हैं तो उस कारण का निवारण करने का मार्ग अपनाइये और उस मार्ग से उस दुःख से निवृत्ति पा जाइये। कहीं आग लगी हुई हो तो वह आग कहाँ से लगी है यह जानकर, आग से विपरीत किसी वस्तु को प्रयुक्त करके आग को बुझाया जा सकता है। यह प्रकृति का नियम है। कहीं बाढ़ आ रही है तो उसको कैसे रोका जाये तो पानी से विपरीत किसी वस्तु से पानी रोका जाये। लेकिन आज लोगों की सोच बिल्कुल भिन्न है। आतंकवाद कहीं कष्ट दे रहा है तो खुद आतंकवादी हो जाइये; आतंकवाद को दबाने की जो चेष्टा कर रहे हैं, तो आग में आग फेंकने जैसा ही है। ऐसे में तो समस्या का जो मूल कारण है, उसी की हम संपुष्टि करते हैं, वृद्धि करते हैं। कुछ उपाय, तथाकथित उपाय मन में आ जाता है कि इस उपाय से समस्या को दबा देंगे। मुझे इसका उदाहरण कुछ दिन पहले दिखाई दिया कि आंध्र और महाराष्ट्र के किसान लोग बहुत कष्ट झेलकर आत्महत्या कर रहे हैं। आत्महत्या की संख्या बहुत हो गयी, ऐसा लगता है। अधिक संख्या में आत्महत्या हो रही है। उसका कारण क्या है? उसका कारण यह है कि कृषि का कार्य लाभदायक नहीं है। ऋण के नीचे दब जाते हैं। ऋण के ऊपर ऋण लेते चले जाते हैं और उसको वापस नहीं कर पाते हैं तो आत्महत्या करते हैं। अगर इस समस्या से किसानों के मुक्ति दिलानी हो तो ऋण लेना न पड़े, यह सोचना होगा। किसान अपनी कृषि कार्य में स्वावलम्बी हो जायें, ऐसा कोई उपाय खोजना चाहिए। उनको और अधिक ऋण देकर उनकी समस्या नहीं सुलझाई जा सकती है। तीन सौ करोड़, चार सौ करोड़ जो कुछ भी पैसा है, एक पैकज के रूप में उनको और दे करके ऋण मुक्त करायेंगे तो यह राहत-भर है। कुछ दिन के लिए राहत शायद मिल जाये लेकिन इससे उनकी समस्या का समाधान नहीं होगा। लाभदायक काम करनेवाले या स्वावलम्बी रूप की व्यवस्था के लोग कर्ज लेना नहीं चाहते हैं। तो इसलिए समस्या के कारण को नहीं खोजना उसका केवल फौरी इलाज कर देना उस समस्या के जीवित रखना है। सामाजिक समस्या को जीवित रखने से कुछ वर्गों को लाभ होता है—यह कहाँ तक ठीक है। यह सब आधुनिक सभ्यता की देन है। इस सभ्यता में यही प्रयास रहता है कि शारीरिक सुख कैसे बढ़ाया जाये, चाहे इसे प्राप्त करने में पूरा जीवन चला जाये, जीवन की सुख-शान्ति चली जाये। आज तथाकथित बहुराष्ट्रीय कम्पनी के मालिक हैं, वे दवा लेकर सोते हैं। वे बस इस खोज में रहते हैं, गुर की खोज में रहते हैं कि कोई ऐसा गुर मिल जाये जो तत्काल टेंशन से मुक्त कर दे; प्रणायाम करके, चाहे जैसे हो, ठीक हो जायें, क्योंकि उनमें मानसिक सन्तुलन नहीं है। कई बार वे खा नहीं पाते हैं, इतने व्यस्त रहते हैं कि उनके पास बच्चों को देखने का समय नहीं है। कहीं जाने के लिए समय नहीं है। खाने के लिए समय नहीं है। “मैं इतना बड़ा आदमी हो गया हूँ, मेरे पास इतना विशाल साम्राज्य है, व्यापार है जिसे मुझे देखना है,” और उसकी ही चिंता में ओत-प्रोत हो जाते हैं। कहीं हवाई जहाज से घुम आते हैं तो कहीं और चले जाते हैं। परन्तु इसमें जीवन की कोई अर्थपूर्ण उपलब्धि नहीं है। शोषण के काम में, उसी चिंता में जीवन चला जाता है; वे पहले दुःख की समस्या को नहीं समझते हैं और उसी में सफलता की अनुभूति करते हैं। दूसरी कोई युक्ति मिल भी जाये और उसमे छुटकारा मिल भी जाये, पर यह ट्रीटमेंट करना-भर होता है। मूल कारण में हम नहीं जाना चाहते हैं।

भगवान् बुद्ध ने एक महान कार्य यही किया कि जो भी दुःख से मुक्ति पाना चाहता हैं, वे दुःख का मूल कारण खोंजे और उसके विपरीत वस्तु विकसित करके उस कारण को मिटाएँ और उससे मुक्ति पा लें। कार्य-कारण का भाव, नयी चेतना, बुद्ध ने सारे विश्व के दिया है। उसी प्रकार महात्मा गांधी ने आधुनिक राजनीतिक समाज के सन्दर्भ में समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए समस्याओं के कारण को खोजना और उस कारण का निवारण करने, समस्या का समाधान करने की एक नयी दिशा हमें दिखाई। गांधीजी के प्रति मेरे मन में बहुत श्रद्धा है, अटूट श्रद्धा है। एक बौद्ध अनुयायी और एक अत्यन्त ईश्वरवादी के बीच में बहुत सहमति हो जाये, सैद्धान्तिक रुप से निरात्मावादी आदमी एक आत्मावादी आदमी से पूर्णरूप से सहमत हो, ऐसा कठिन होता है। परन्तु गांधीजी के जो उपदेश हैं उनको हम बहुत ही महत्त्वपूर्ण मानते हैं। इस बीच में, पाँच हजार वर्ष में, भारत के इतिहास में गांधी जैसा कोई दूसरा महापुरुष नहीं हुआ है जिन्होंने सभी धर्मों की बात को और विशेष रूप से भारतीय सांस्कृतिक परम्परा को राजनीति में, समाजनीति में कैसे उपयोग किया जा सकता है—यह बताया। बुद्ध और जैन दोनों परम्परागत अहिंसावादी रहे हैं। तथागत बुद्ध ने अहिंसा को ही अपना धर्म-प्रसार बताया। जैन-शास्त्रकारों ने भी ‘अहिंसा परमो धर्मः’ नाम से इसे प्रसारित किया। परन्तु हजारों वर्ष तक हम लोग यह समझते रहे है कि अहिंसा का पालन आध्यात्मिक सधना में ही होता है। सामाजिक कार्य में, राजनीतिक कार्य में, विशेष रूप से राष्ट्र-व्यवस्था में सम्पूर्ण अहिंसा का उपयोग हो सकता है—इस पर विचार नहीं किया गया। यह समझ में नहीं आया था। अब बौद्ध-दर्शन के देखें, जैसे थाइलैण्ड-लंका है, बर्मा है, तिब्बत या मलेशिया है। ये सब अपने को बौद्ध-देश मानते थे और बुद्ध के उपदेशों को अपनाने के लिए तत्पर थे। परन्तु राज-व्यवस्था में इन्होंने सेना भी रखी, पुलिस भी; दण्ड-व्यवस्था भी रखी, युद्ध भी हुए। युद्ध-लड़ना धर्म-विरुद्ध है, ऐसा समझ में नहीं आया। बड़े शर्म की बात है अगर बर्मा और थाइलैण्ड के इतिहास को देखें तो थाइलैण्ड और बर्मा के बीच में नौ बार बड़े और छोटे युद्ध हुए हैं। किस बात को लेकर युद्ध हुए? थाइलैण्ड में रखे हुई जो इमिरन की मूर्ति है, इमिरन महँगे होते हैं और इमिरन की महँगी प्रतिमा है। वह कभी बर्मा ले जाते थे तो थाइलैण्ड के राजा युद्ध करके उसे फिर से ले आते थे और बर्मा के राजा युद्ध करके उसे फिर ले आते थे। इसलिए युद्ध हुआ। अगर तथागत बुद्ध जीवित होते तो क्या सोचते? उनकी प्रतिमा के लिए लोगों का हत्या हो रही है, हिंसा हो रही है। कई देशों ने फाँसी नहीं रखी है, लेकिन आजीवन कारावास तथा बहुत कष्टदायक दण्ड-व्यवस्था रखी है। तो यह सब धर्म-विरुद्ध है। यह कभी राज्य की व्यवस्था के लिए, राज्य की सुरक्षा के लिए आवश्यक समझा गया। राजनीति में और राज्य-व्यवस्था में सम्पूर्ण अहिंसा अपनायी जा सकती है, राष्ट्र के आन्दोलन में सम्पूर्ण अहिंसा को अपनाया जा सकता है—यह किसी की समझ में नहीं आया, यही सोचते रहे कि अहिंसा के उपदेश तो केवल आध्यात्मिक जीवन में ही अपनाये जा सकते हैं। व्यक्तिगत रूप से कोई भिक्षु बन गये, कोई साधु बन गये और कोई गुफा में बैठे हुए हैं और साधना कर रहे हैं। उनके लिए तो अहिंसा अपने-आप हो जाती है, वे क्या हिंसा करेंगे। जहाँ पर हिंसा होने की सम्भावना है वहाँ पर धर्म के रोकना चाहिए, वह हम रोक नहीं पाये। गांधीजी ऐसे पहले व्यक्ति हुए जिन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन में अहिंसा का उपयोग किया। राष्ट्र की सुरक्षा अहिंसा के माध्यम से की जा सकती है। न्याय-सभा में भी अहिंसा के माध्यम से, आर्थिक-व्यवस्था में भी अहिंसा के माध्यम से काम किया जा सकता है। उन्होंने केवल बताया ही नहीं, बल्कि उसका एक्सपेरिमेंट करके, प्रयोग करके जीवन में उतार कर सिद्ध कर दिया, हमारे सामने।

कभी मुझे धम्मपद और ‘हिन्द-स्वराज’ में से एक को चुनने तथा उसको आधार मानकर काम करने को कहा जाय तो मेरी ‘हिन्द-स्वराज’ प्राथमिकता होगी। इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं बुद्ध के ऊपर गांधीजी के मानता हूँ, लेकिन हमारे जीवन में प्रासंगिक ज्यादा ‘हिन्द-स्वराज’ है। धम्मपद में जो कहा गया, उसे हम जीते भी हैं, लेकिन हम राजनीति में, राष्ट्र के आन्दोलन में, जिसमें हम लोग लगे हुए है, वहाँ पर कैसे अहिंसा का प्रयोग हो सकता है, यह धम्मपद नहीं बताता है। यह ‘हिन्द-स्वराज’ बताता है तो हमारे लिए यह ज्यादा प्रासंगिक हुआ। जिस बात में हम लोग उलझे हुए हैं और जिस बात से हम ग्रस्त हैं और जिसका हम समाधान खोज रहे हैं, वह ‘हिन्द-स्वराज’ में मिलता है तो यह हमारे लिए प्रासंगिक है। वे हमको एक वैकल्पिक व्यवस्था भी देते हैं। हम हिंसा छोड़ने की स्थिति में नहीं हो तो अपने राष्ट्र के आन्दोलन को ही छोड़ दें, ऐसा नहीं है। हिंसा छोड़ने का अर्थ यह नहीं है कि अपने न्याय के लिए कुछ न करें, एकदम चुप होकर बैठ जायें। गांधी-विचार हमारे लिए ज्यादा आवश्यक है और प्रासंगिक भी है। इसे समय की आवश्यकता कहना चाहिए। तो इसमें सबसे ज्यादा मुझे जो आकर्षित करता है, वह यह है कि 1909 में आधुनिक सभ्यता को नकारने की हिम्मत गांधीजी ने रखी। आज तो आधुनिकता को, आधुनिक सभ्यता को नकराने में, इसका सामना करने में अनेक लोग एवं संस्थाएँ आगे आयी हैं। उस समय तो आधुनिक साइंस के विरोध में जाने का लोगों में साहस नहीं था। विज्ञान का इतना प्रभाव था। लेकिन गांधीजी ने इस सत्य को देखा। आज से 100 वर्ष पहले ऐसे समय में विरोध में कहा, जिस समय साइंस और तकनीक का दुष्प्रभाव उतना नहीं था, जितना आज है; उस समय इसके दूरगामी प्रभाव, जो इसका इफेक्ट है, उसको देख लिया और देखा ही नहीं उसको समझा और स्पष्ट रूप से समझा। सचमुच गांधीजी महापुरुष थे, यह इससे स्वतः सिद्ध हो जाता है।

आज इतने बड़े भारतवर्ष में भी उनके अनुयायी, गांधीजी के तथाकथित माननेवाले भी आधुनिकता को नकारने में कष्ट का अनुभव करते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि उसमें अच्छा लगता है, आधुनिक सभ्यता उनके लिए सुखदायक है; इसलिए उसको नकारने में असुविधा होती है। एक मेरे मित्र ने गांधीजी के ऊपर ग्रंथ लिखा है। वह जैसे ही प्रकाशित हुआ, उन्होंने मुझे स्नेहपूर्वक भेंट किया। तो मैंने बहुत आदरसहित उसको पढ़ने के लिए लिया। विषय में देखा तो यह लिखा था कि ‘हिन्द-स्वराज’ सदा अपने में निहित होता है, वह विशेष परिस्थिति में, विशेष ऑर्गन्स के लिए और विशेष राजनीतिक सन्दर्भ में लिखा गया है; इसलिए उनको गांधीजी का अन्तिम शब्द न माना जाये। लेकिन आज सभ्यता का दोष सामने आने के बाद भी विद्वान लेखक हिन्द-स्वराज को बचा-बचा कर देखता है और उस पर चार-पाँच पृष्ठ ही लिखता है—यह मान लिया गया है कि अगर हो सके तो हिन्द-स्वराज को पढ़ें ही नहीं, उसको छोड़ दिया जाये।

हिन्द-स्वराज में चार विषय प्रमुख रूप से प्रतिपादित हैं। हिन्द पराधीन कैसे हुआ और क्यों हुआ? और वह किस ‘पर’ के अधीन हुआ? वह ब्रिटेन के पराधीन नहीं हुआ; आधुनिक सभ्यता के पराधीन हुआ। उससे हमको स्वाधीन होना हो, स्वराज लेना हो तो क्या काम करना है और स्वराज का सही अर्थ क्या होगा? मेरी दृष्टि से यो चार विषय हैं और प्रमुख रूप से इन चार विषयों पर उन्होंने अपना मत व्यक्त किया है। हम लोग आज जिस परिस्थिति में हैं, उसमें ‘हिन्द-स्वराज’ का और भी अधिक महत्त्व हो जाता है। जहाँ-जहाँ ब्रिटेन की बात हो, वहाँ पर चीन को डाल दिया जाये; जहाँ-जहाँ भारत के बारे में लिखा गया हो वहाँ तिब्बत को डाल दिया जाये तो आज वह एक हमारी कथा हो जाती है। हमारे लिए बिल्कुल उपयुक्त उदाहरण है। क्यों तिब्बत को चीन ने कब्जे में किया; वह आज कैसा प्रतीत होता है और उसके स्वराज के लिए हमको क्या प्रयास करना चाहिए। यह शत-प्रतिशत हमारे ऊपर लागू हो जाता है। मैं तो कहूँगा कि तिब्बत के स्वराज मिलना चाहिए। हम सबकी मौलिकता के ऊपर तथाकथित आधुनिकता इतनी छा गयी है कि आज कोई भी स्वावलम्बी नहीं हो सकता; स्वावलम्बन हम साध नहीं सकते ऐसा सोचते हैं। जे. कृष्णामूर्ति के शब्दों में कहा जाये तो हमारे मन की कंडीशनिंग (संस्कारबद्धता) हो गयी है; मन के ऊपर आधुनिक सभ्यता का इतनी कंडीशनिंग हो गयी है कि हम गांधीजी के विषय में भी सोचते हैं तो आधुनिक सभ्यता के दृष्टिकोण से ही सोचने लग जाते हैं कि उस दृष्टि से ये सारे प्रासंगिक हैं कि नहीं और विकल्प देते हैं कि नहीं। तो ये सारे प्रश्न उठते हैं। आधुनिक सभ्यता के दृष्टिकोण को लेकर उसे खोजने और देखने की प्रक्रिया अपनायें और उसी को लेकर हम चलें तो गांधीजी के जो सिद्धान्त हैं, वे दूसरी तरह के लगेंगे। तब ये दोनों प्रश्न बिल्कुल भिन्न रूप में होंगे। हम एक हिन्दुस्तानी की दृष्टि से या तिब्बती की दृष्टि से, जो भारतीय परम्परा से पुरस्कार में मिली हुई हैं, देखेंगे तो इसमें दोनों प्रासंगिक हैं; साथ ही, इसमें पूर्ण स्वावलम्बन और विकल्प की व्यवस्था भी मिलती है।

विकल्प की व्यवस्था बिल्कुल ही सरल है। पराधीनता से स्वाधीन समाज; परराज से स्वराज होना; यह बिल्कुल स्पष्ट है और सरल है। आज उपाय क्या है? स्वधीनता और स्वराज हर मनुष्य की जन्मसिद्ध प्रकृति है और हम उसको खोना चाहें तो खो सकते हैं। इसको मैं अधिकार नहीं कहता, यह तो प्रकृति से ही प्राप्त है। मनुष्य स्वाधीन रूप से ही उत्पन्न होता है, इसलिए पता नहीं, आपने ध्यान दिया होगा कि नहीं दलाई लामाजी ने अपनी दूसरी जीवन-गाथा, आत्मकथा लिखी है, उनका नाम रखा है “फ्रीडम इन ए सेंट”। हम शरणार्थी होते हुए भी और शरण में रहते हुए भी कितना स्वाधीन रहे हैं। एक तरह से हमें स्वेच्छा से जीने की अवसर मिला है। तो मुझे लगता है कि उन्होंने बहुत अच्छा शीर्षक रखा है। अगर कोई भी आदमी स्वावलम्बी और स्वराज के रूप में जीवन जीना चाहे तो उसमें कोई कठिनाई नहीं है। कोई बाह्य चीज उसको रोक नहीं सकती। यह अपने-अपने मन की बात है और अपने अधिकार की या अपने स्वेच्छा की बात है; सही मायने में ऐसा हो सकता है।

यह पृथ्वी कितने दिन हम लोगों के लिए सुरक्षित रहेगी इसका कोई ठिकाना नहीं है। यह पृथ्वी नहीं रहेगी तो मनुष्य एवं अन्य जो सारे जीव-जन्तु इस पृथ्वी पर रहते हैं, वे सब नष्ट हो जायेंगे। इसलिए आज हमारे जो प्रश्न है, वह छोटी-मोटी समस्या का प्रश्न नहीं है। जीवन और मरण का प्रश्न है। जिस प्रकार की आर्थिक विषमता इस विश्व में है, उसमें पूरे विश्व के बीस प्रतिशत लोग अस्सी प्रतिशत साधनों का उपयोग कर रहे हैं और अस्सी से अधिक प्रतिशत मनुष्य बीस प्रतिशत से कम साधनों का उपयोग कर पा रहे हैं। तो यह अस्सी प्रतिशत लोग चाहे जीयें, चाहे मरें, इसे उन्हीं पर छोड़ा हुआ है। आर्थिक शोषण और आर्थिक विषमता का यह हाल है। जो साधनहीन गरीब है वह तो एक आवश्यक वस्तु के रूप में है, अमीरों के लिए। विकासशील देश विकसित हो जायेगा, यह सोचना बिल्कुल मृगतृष्णा ही है। यह जो गैप है, अन्तर है, बढ़ता जा रहा है; इसके कम होने का तो कोई सवाल ही नहीं है। यह सोच बन रहा है कि गरीब को गरीब रहना ही है। इस आर्थिक विकास की दौड़ के कारण पर्यावरण जितना प्रदूषित हुआ है, उसका कोई हिसाब नहीं है और उस प्रदूषण को सुधारे जाने का कोई उपाय साइंस और टेक्नालॉजी का पास नहीं है। ग्लोबलवार्मिंग एवं अन्य समस्याओं को कैसे रोका जाये, यह उपाय मालूम भी हो तो उसे कोई अपनाने का लिए तैयार नहीं है। चाहे कुछ भी हो जाये, अमेरिका के लिए जीवन-शैली को बदलना सम्भव नहीं है। यह साफ तौर पर कह दिया गया है। प्रोटोकोल में दस्तक नहीं करने का एकमात्र कारण यही बताया गया है कि हम अमेरिका की जीवन-शैली कैसे बदल सकते हैं। क्योंकि हम तो अमेरिका हैं और हमने तो अमेरिका जैसी जीवन-शैली पसन्द की है। तो इस अहम् को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि पर्यावरण प्रदूषण के विनाश से हम छूट पायेंगे। और हिंसा में इतनी अधिक वृद्धि हो गयी है कि कोई आदमी कहीं पर भी अपने के सुरक्षित नहीं मानता। आज से 20-25 वर्ष पहले किसी नेता से मिलने में कोई खास कठिनाई नहीं थी। आज तो किसी भी नेता से मिलना हो तो 15-20 बन्दूकधारी लोगों के बीच से गुजरकर मिल पाते हैं, नहीं तो नहीं मिल पाते हैं। हम जहाज में जाते हैं तो चार-पाँच बार अपने शरीर की जाँच कराकर, एक्स-रे कराकर जा पाते हैं। हिरोशिमा और नागासाकी आज भी हमारे दिमाग में ताजा है और उसकी पुनरावृत्ति होने की सम्भावना हर जगह बनी हुई है। युद्ध एक व्यापार हो गया है, इसलिए युद्ध करना आवश्यक हो गया है। दो पड़ोसी देशों में कोई भी शस्त्र-व्यापारी देश में जाकर दोनों को कह दे कि देखो, हमने उसे बम बेचा है। तुम सुरक्षित नहीं हो। अगर तुम सुरक्षित होना चाहते हो तो हमसे बम खरीदो। उससे ज्यादा हथियार हम तुमको देंगे। हमने तो बम एवं अन्य शस्त्र उन्हें बेच दिये हैं, अगर उसका काट रखना है तो तुम भी हमसे उनसे ज्यादा हथियार खरीदो। यह एक व्यापार का तरीका हो गया है। इसलिए युद्ध से हम कहीं पर भी छुटकारा नहीं पा सकते हैं। अब और बाकी बातें छोड़िये; धर्म को भी लड़ने का हथियार बनाया जा रहा है। धर्म के नाम पर आज लोगों को इतना विभाजित कर दिया गया है कि लोग धर्म के नाम पर युद्ध करने को तैयार हैं। अगर इस पृथ्वी को बचाना है, इस सम्पूर्ण जगत को, सम्पूर्ण राष्ट्र को नष्ट होने से बचाना है तो गांधीजी का ही एक मार्ग है। गांधीजी सत्य और यथार्थ की बात कहते हैं। संसाधन सीमित हैं तो जितनी हमारी आवश्यकता है, उतना ही उपयोग करें। उपभोक्ता मात्र ही न बनें क्योंकि सारे संसाधन सम्पूर्ण मनुष्य के लिए हैं, सबके हैं, सबके उपयोग के लिए हैं। इसलिए अपनी जरुरत से अधिक जितना भी उपयोग करेंगे, वह चोरी के बराबर होगा। इसके लिए गांधीजी ने ट्रस्टीशिप का सिद्धान्त रखा। मुख्य बात अर्थ-व्यवस्था को ठीक करने की है। यह अर्थ-व्यवस्था बिगड़ी क्यों? यह आधुनिक सभ्यता का ही परिणाम है। गांधीजी ने आज से सौ वर्ष पहले ‘हिन्द-स्वराज’ पुस्तक में आधुनिक सभ्यता की कड़ी टीका की और कारण के साथ उसके निवारण का मार्ग बताया। आधुनिक सभ्यता को छोड़कर, हमें अध्यात्मिक सभ्यता की ओर जाना होगा। यही हमारा एकमात्र विकल्प है।

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